बच्चों का खेल

                              बच्चों का खेल 




            एक समय की बात है , गौतम बुद्ध किसी गाँव में गए। गाँव की सीमा पर एक नदी थी और वहां कुछ बच्चे खेल रहे थे। वह बड़ी ही गंभीरता से रेत से घर बनाने की कोशिश में लगे हुए थे। 

           जहां बहुत बच्चे खेल रहे होते हैं , वे एक - दूसरे को तंग भी करते हैं। वहाँ भी बहुत बच्चे खेल रहे थे। वे एक दूसरे के बनाए हुए रेत के घरों से छेड़छाड़ भी कर रहे थे। यूं भी रेत के घरों को बिगाड़ने के लिए एक पत्थर की ठेस ही पर्याप्त होती है। बच्चे एक दूसरे के घरौंदों को बिगाड़ने के लिए कोशिश करते और फिर एक दूसरे पर गुस्सा करने लगते। बुद्ध जी ये खड़े हुए देख रहे थे। 

            थोड़ी देर बाद सूर्यास्त का समय होने लगा। बच्चों की माँ उन्हें अपने घर बुलाने लगीं , " बच्चों अब अपने घर आ जाओ , नाश्ता तैयार है। आकर नाश्ता कर लो। 

             ये सुनते बच्चे अपने ही बने हुए रेत के महल पर कूद लगा देते हैं। 

            वही घर जिसे अभी बच्चो ने अपने लिए बनाया था और आपस में उसी घर के लिए  लड़ रहे थे। उन्होंने अपने बनाये हुए घरों पर कूद लगाई और अपने-अपने घर की ओर भाग गए। पीछे मुड़कर भी नहीं देखा। 

             बुद्ध ने अपने शिष्यों से कहा , " जीवन इससे अधिक कुछ भी नहीं है। "

              हमारी साड़ी गंभीरता इसी रेत के महलों के लिए ही है। उन्ही महलों के लिए , जिसे एक दिन आप खुद ही छोड़कर चल देंगे और फिर पीछे मुड़कर भी नहीं देखेंगे। 

             जो लोग गंभीरता में डूबे रहते हैं , वो जिंदगी के असल आनंद की ख़ूबसूरती से अनछुए रह जाते हैं। 

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