#हिन्दी बाहुल्य भाषी राष्ट्र में अपनी ही अस्मिता को बचाने जंग लड़ती हमारी राजभाषा (देवनागिरी लिपि).
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संविधान सभा द्वारा संविधान के अनुच्छेद 343(1) के अंतर्गत 14 सितंबर 1949 को हिंदी को राजभाषा और लिपी को देवनागिरि लिपी स्वीकार किया गया ...और 26 जनवरी 1950 को हिंदी भाषा को राष्ट्रीय धरातल पर राजभाषा के रूप में संवैधानिक मान्यता प्राप्त हुई....
भारतीय संविधान की रचना के समय यह 395 अनुच्छेदो और 22 भागो में विभाजित था,भाग 5 में अनुच्छेद 120 संघ की राजभाषा,भाग 6 में अनुच्छेद 210 ,राज्य की राजभाषा जबकि भाग 17 पूरा राजभाषा से संबद्ध रखता है जिसमे अनुच्छेद 343 से 351 तक संबंधित है; इससे इतर राष्ट्रपति आदेश ,नियम ,अधिनियम और प्रमुख संशोधन भी शामिल है,संविधान निर्माण के समय दक्षिण भारतीय प्रभावों के विशेष विरोध के स्वरूप केवल 15 वर्षो के लिए अंग्रेजी भाषा के शासकीय समावेश को सहयोगी राजभाषा के रूप में स्वीकार किया गया था पर उच्चतम न्यायालय की भाषा को आधार मानकर अंग्रेजी का विस्तार आगे वर्षो के लिए बढ़ाया गया,जो की आज तक निरंतर जारी है , न केवल जारी है बल्कि राजभाषा को पछाड़कर यह अपने आयाम पर है !!
भाषा का ज्ञान और विषय का ज्ञान में मौलिक अंतर होता है!!
हमारे देश में गरीब और मध्यम वर्ग के लगभग 73% से 76% बच्चे अपनी प्राथमिक शिक्षा सरकारी, हिंदी या अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में करते है,जबकि इन संस्थानों में अंग्रेजी की क्या स्थिति रहती है ये आप सभी बहुत अच्छे से जानते है ,अंग्रेजी में प्राथमिक आधार कमजोर होने के बाद भी आप अपेक्षा रखते हैं कि अंग्रेजी भाषा में मजबूत पकड़ रखने वाले कर्मचारी प्राप्त हो,जिसके परिणामस्वरूप आर्थिक रूप से कमजोर और ग्रामीण वर्ग प्रतिभा होते हुए भी वंचित रह जाता है, इस समस्या का मूल कारण भी सरकार जानती है!!
*शिक्षा और स्वास्थ चिकित्सा सेवाएं दोनो ऐसे विषय है जिन पर अमीर गरीब का आर्थिक भेदभाव नहीं होना चाहिए !*
शिक्षा और स्वास्थ चिकित्सा सेवाओं में समानता ही एक मजबूत राष्ट्र का निर्माण कर सकती है जहां सभी को समान प्राथमिक शिक्षा मिले साथ ही बेहतर गुणवत्ता की शिक्षा मिले और सभी को समान रूप से चिकित्सा सेवा मिले!!
एक कोल कर्मचारी होने के नाते बात करे कोल इंडिया के विषय में तो (31 मार्च 2023 तक के आंकड़ों के अनुसार) 2,39,210 के कुल कर्मचारी आंकड़ों में लगभग 2,22,905 ...
अनुमानतः लगभग 93.19% गैर कार्यकारी और 16305 कार्यकारी जिनका 6.81% है...इन सभी कर्मचारियों में लगभग 52% से 56% ऐसे कर्मचारी है जिनकी प्राथमिक या तो हो नहीं पाई या अगर हो भी पाई तो उनकी अंग्रेजी भाषा में पकड़ लगभग नगण्य है!
लगभग 29 से 34 % ऐसे जिनकी प्राथमिक शिक्षा के आगे पढ़ने के बाद भी अंग्रेजी भाषा की केवल नाममात्र जानकारी है पर वे भी अपनी स्थिति को बहुत अधिक स्पष्ट नहीं बता सकते,इसका एक प्रमुख कारण उनकी प्राथमिक और स्कूली शिक्षा में हिंदी या अन्य क्षेत्रीय भाषा माध्यम और उसके बाद अचानक कॉलेजों में अंग्रेजी थोपे जाने की प्रक्रिया को मानते है!
शेष कुछ की ही अंग्रेजी भाषा की जानकारी कुछ हद तक ठीक है इनमे भी बहुतों को समय समय पर शब्दकोश की सहायता लेनी पड़ती है!!
कुल मिलाकर लगभग तीन चौथाई से भी कहीं अधिक अंग्रेजी भाषा को सटीकता से नहीं जानने वाले; इतने बड़े स्तर पर आपके कर्मचारियो में बड़ी बड़ी मीटिंग और उनके भविष्य के निर्णयों का संवाहन केवल अंग्रेजी भाषा में किया जाता है , इतने बड़े स्तर की बात तो एक तरह उचित भी लगे पर छोटे छोटे स्तर पर निर्णयों को भी ऐसी अंग्रेजी भाषा में मजदूर भाईयो के समक्ष रखा जाता है, जिनके विषय में ज्यादा तर्क ही न कर सके!!
क्या यह उचित है ; एक तरफ हम राजभाषा को मजबूत करने हम राजभाषा सप्ताह मनाते है, राष्ट्रीय स्तर पर भी विभिन्न कार्यक्रम आयोजित होते है, पर धरातल पर उसकी अवमानना ही होती है और स्थिति बहुत गंभीर है,और होते जा रही है !!
आदरणीय श्री अमर नाथ जी (प्रो. हिंदी विभाग कोलकाता विश्वविद्यालय) की एक फेसबुक पोस्ट पर देखा,हिंदी भाषा के प्रख्यात कवि आदरणीय श्री नरेश सक्सेना जी हाल ही में रूस की यात्रा कर भारत लौटे, उन्होंने बताया रूस की राजधानी मास्को में अंग्रेजी भाषा के जानकार कोई भी नहीं मिला, वहां सभी कार्य उनकी अपनी भाषा में संपन्न होते है,इसके बाद भी रूस ने इतनी प्रगति कर ली,जबकि हमारे देश में सफलता की मूल कुंजी अंग्रेजी भाषा को माना जाता है,,उन्होंने बताया कि इंसान कितनी भी भाषा जान ले, वह सोचता अपनी भाषा में है लोग अंग्रेजी पढ़ते है उसे समझने के लिए अपनी भाषा में अंतःअनुवाद करते है और लिखने के लिए उसे फिर से अंग्रेजी में अनुदित करना पड़ता है इस तरह से हमारे जीवन का एक बड़ा हिस्सा दूसरी भाषा सीखने में चला जाता है, व्यक्ति का अपनी भाषा में कार्य ना करना परिणामस्वरूप व्यक्ति की प्रतिभा का पूरा विकास नहीं हो पाता और ना ही पूरे प्रयोग से कार्यों का निष्पादन!! ......
रूस ही नही दुनिया के कई विकसित देश चीन,जापान,अमेरिका,ब्रिटेन,जर्मनी,फ्रांस अपनी देश की भाषा में पढ़ते है, और कार्यों का निष्पादन करते है फलस्वरूप उनमें अपेक्षाकृत मौलिक चिंतन और प्रयोग के आयाम सार्थक और कई अधिक होते है!!!
मौलिक चिंतन करें ,राजभाषा के साथ न्याय करें और उसे अवसर प्रदान करें!!
"धन्यवाद"
सदैव आपके सम्मान में
एक भारतीय हिन्दी भाषी........

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