'गुरु पूर्णिमा, गुरु की महिमा और भारतीय संस्कृति'

 'गुरु पूर्णिमा, गुरु की महिमा और भारतीय संस्कृति' 


***************************

★गुरु और शिक्षक में अंतर है। गुरु ज्ञान देता है, शिक्षक शिक्षण करता है। गुरु-शिष्य की एक परंपरा है, जिसमें गुरु के पीछे जुड़कर शून्य अथवा नगण्य (अ) भी विशिष्ट हो जाता है– गुरु +अ =  गौरव। 


★शिक्षक तो शिक्षा के निमित्त (अर्थ) आए हर शिक्षार्थी के लिए शिक्षण का कार्य करता है। गुरु से यह अपेक्षा रहती है कि वह शिक्षा ग्रहण करने आए शिक्षार्थी (छात्र) को शिष्य बना दे। छात्र होना तो एक अवस्था है। छात्र तो वह है, जो गुरु के सान्निध्य में रहता है– छात्र का अर्थ ही है : 'वह जो छत्र (छाता) लगाकर गुरु के पीछे चलता है।'  गुरुकुल में गुरु के पीछे उनके छात्र छत्र उठा कर चलते थे। शिष्य होना एक गुण है, जिसे शिष्यत्व कहते हैं। शिष्य का अर्थ है– जो सीखने को राजी हुआ, जो झुकने को तैयार हो...जिससे उसका जीवन उत्कर्ष की ओर जाए।


★गुरु और शिष्य एक परंपरा बनाते हैं। उनमें सिर्फ शाब्दिक ज्ञान का ही आदान-प्रदान नहीं होता। गुरु तो शिष्य के संरक्षक के रूप में कार्य करता है। वह ज्ञान प्रदाता होता है, अपना ज्ञान शिष्य को देता है; जो कालांतर में पुनः यही ज्ञान अपने शिष्यों को देता है। यही गुरु-शिष्य-परंपरा है अथवा परम्पराप्राप्तमयोग है। 


★शिक्षक और छात्र एक परंपरा नहीं बनाते। शिक्षक तो अधिगम( learning) को सरल बनाता है, इसलिए अँगरेज़ी में उसे facilitator of learning कहते हैं। विद्यालय जाकर विद्या की आकांक्षा रखने वाला विद्यार्थी (विद्या +अर्थी) छात्र भी हो जाता है, जबकि बिना गहन विनम्रता के शिष्य नहीं होता, शिष्यत्व घटित ही नहीं हो सकता।


★आज गुरु पूर्णिमा है। शिक्षक दिवस की तुलना में इसका आध्यात्मिक महत्त्व अधिक है, क्योंकि शिक्षक की तुलना में गुरु की महिमा अधिक है।


★गुरु पूर्णिमा अधिक प्रतीकात्मक है। आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा मनाने के पीछे कारण यह है कि आषाढ़ पूर्णिमा के दिन अमूमन आकाश में घने बादल छाए रहते हैं।  प्रतीकात्मक रूप से इन अँधियारे बादलों को शिष्य और पूर्णिमा के चाँद को गुरु माना गया है। अगर सिर्फ चाँद को देखना होता तो, शरद पूर्णिमा को चुना जाता परंतु गुरु की महिमा तो शिष्यों के कल्याण से ही है।


★आशा की जाती है कि जैसे चाँद के प्रकाश से अँधियारे बादलों में भी प्रकाश प्रकीर्तित, परावर्तित होता है, वैसे ही हमारे जीवन में भी गुरु की ज्ञान-रश्मियाँ फैलें। संयोग से इसी दिन वेद व्यास जी का भी जन्मदिन मनाया जाता है। 


★आर्ष परंपरा के सभी गुरुओं को प्रणाम करते हुए, गुरु पूर्णिमा की स्वस्तिकामनाएँ!


आपका ही,

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ