अच्छी हिंदी : भाग 2

[चिर एवं चीर में अंतर, चिरकांक्षित, चिता, चैत्य]


१. ‘चिर’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘चि’ धातु से हुई है। यह एक समूह वाचक शब्द है, जो चुनना और बीनना के लिए व्यवहृत होता है। वैसे, ‘चिर’ शब्द का अर्थ है–  बहुत दिनों तक रहने वाला, दीर्घायु, चिरायु, अधिक समय तक। अगर मात्रा ह्रस्व से दीर्घ हो जाए (चीर), तो इसका अर्थ हैः वस्त्र, कपड़ा, कपड़े का टुकड़ा, चीर का पेड़, सीसा नामक धातु, गाय का थन, चार लड़ियों की माला आदि। ऐसे, यह 'चीर' शब्द बना है– 'चीरम्'(चि+क्रन् दीर्घश्च) से। 


२. अब अगर ‘चिर’ का अर्थ ‘बहुत दिनों तक रहने वाला अथवा ‘अधिक समय तक’ ध्यान में रखा जाए, तो चिरंजीवी अनेक वर्षों तक जीवित रहने वाले को कहेंगे। 'चिरम्+जीव=चिरंजीव'। 'चिरंजीव' से 'चिरंजीवी' शब्द बना है। 'चिरयुवा' शब्द का अर्थ है– अनेक वर्षों तक युवा रहने वाला।


३. यह जानना रोचक है कि अगर चिरंजीव, चिरंजीवी, चिरयुवा आदि मूलतः जीवन से जुड़े शब्दों में 'चि' धातु है, तो 'चित्त' और 'चिंता' जैसे जीवनावधि के कुछ महत्त्वपूर्ण शब्दों में भी 'चि' धातु है और साथ ही जीवनकाल के पश्चात् मृत्यु से जुड़े 'चिता', 'चैत्य' आदि शब्दों में भी 'चि' धातु है। 'चि' धातु का अर्थ चयन, चुनाव आदि है, तो इसके आधार पर कह सकते हैं कि 'चित्त' सोच-विचार, चिंतन-मनन कर सही अथवा ग़लत का चयन करता है और 'चिंता ' में व्यक्ति कुछ ऐसी नकारात्मक बातों को चुन लेता है, जो उसे अंदर से निरन्तर परेशान करती हैं। 


इसी तरह ध्यान दें कि 'चिता' में दाह-संस्कार के लिए लकड़ियाँ चुनने का भाव है और जिन सम्प्रदायों में दाह-संस्कार नहीं होता, उनमें 'चिता' शब्द भी नहीं मिलता। एक और वाचिक प्रयोग पर ध्यान दें– "चिता सज गई।"  चिता में तो मुख्यत: लकड़ियाँ ही होती हैं, अतः, 'चिता' में निहित 'चि' धातु का 'चुनने अथवा लकड़ियाँ चुनने' का अर्थ स्पष्ट हो जाता है। 'चैत्य' उस स्थान को कहते हैं, जहाँ बौद्ध धर्म के किसी महापुरुष की समाधि होती है। ऐतिहासिक साक्ष्य हैं कि इन चैत्यों में महापुरुषों के शारीरिक अवशेष(अस्थियाँ आदि) चुन कर रखे गए। इस तरह चैत्य में भी 'चि' धातु का 'चुनना' अर्थ परिलक्षित होता है।


 अब 'चिर' से बने कुछ अन्य शब्दों को देखते हैं:

चिरसेवक–सदा के लिए सेवक


चिर-रोगी= अनेक वर्षों तक रोगी रहने वाला।


चिरकांक्षित= अनके वर्षों की इच्छा अथवा चाह।


चिरविस्मृत (चिर+वि+स्मृत)= सदा के लिए विस्मृत


चिरसम्मानित (चिर+सम्+मानित)


इसी तरह 'चिर' से बनने वाले अन्य शब्द हैं–

चिर-विरह, चिर-बैर, चिर-शांति, चिर-निद्रा (मृत्यु), चिर-स्थायी, चिर-स्मरणीय, चिर-परिचित, चिर-नूतन, चिर-पुरातन, चिरकारी, चिरमान्य, चिरपोषित, चिरप्रतीक्षित, चिरनवीन, चिरयौवन आदि। हम स्वभाववश अथवा अपरिचय के कारण कुछ जाने-पहचाने शब्दों के अलावा इनका प्रयोग ही नहीं करते।


 चिराकांक्षा : 'चिर+आकांक्षा= चिराकांक्षा'। आकांक्षा में 'कांक्ष्' धातु है, जो चाह अथवा इच्छा को अभिव्यक्त करता है। ध्यातव्य है कि इच्छा अच्छी अथवा बुरी कुछ भी हो सकती है, परंतु आकांक्षा 'सद्' अथवा भली ही हो सकती है। यह धन, शक्ति, सिद्धि, प्रसिद्धि आदि की हो सकती है। यह आकांक्षा और बड़ी अथवा उच्च हो जाए, तो 'उच्चाकांक्षा' कहलाती है।


अगर आपकी कोई पुरानी अभिलाषा अथवा इच्छा हो, तो आप उसके लिए ‘चिरकांक्षित’ शब्द का प्रयोग कर सकते हैं।

चिरकारी–  दीर्घसूत्री अथवा सब कामों में देर करने वाला।


चिरातन–  पुराना, चिरंतन


अस्तु, 'चिर और 'चीर' विमर्श के क्रम में यह स्मरण रहे कि अगर आपने ‘चीरान’ शब्द पढ़ा है, तो उसका अर्थ है–  लकड़ी/कागज़ आदि को 'चीरने' की क्रिया। इसे ‘चिराई’ भी कहते हैं। अस्तु, अगर आपने 'चीरान' की जगह 'चिरान' लिख दिया, तो अर्थ बदल जाएगा। 'चिरान' का अर्थ है– 'बहुत पुराना'।


चिरिया, चिरैया, चिरई जैसे शब्द चिड़िया के पर्यायवाची हैं, जबकि ‘चीवर’ सन्यासियों अथवा भिक्षुओं का फटा-पुराना वस्त्र होता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि 'चीवर' एक 'तापस' अर्थात् 'सन्न्यासियों से संबद्ध' शब्द है।


‘चिरंभ’ का अर्थ इन सबसे नितांत भिन्न है। चिरंभ कहते हैं– चील पक्षी को।

 'चिर' एवं 'चीर' के अंतर के क्रम में हमने देखा कि मात्रा का ह्रस्व से दीर्घ अथवा दीर्घ से ह्रस्व होने से अर्थ बिलकुल ही बदल जाता है।


साभार : श्री कमल जी 

एक टिप्पणी भेजें

1 टिप्पणियाँ