होली
1 .
'कल होली है।'
'होगी।'
'क्या तुम न मनाओगी ?'
'नहीं।'
'नहीं?'
'न। '
'क्यों?'
'होगी।'
'क्या तुम न मनाओगी ?'
'नहीं।'
'नहीं?'
'न। '
'क्यों?'
'क्या बताऊँ क्यों ?'
'आखिर कुछ सुनूं भी तो। '
'सुनकर क्या करोगे ?'
'जो करते बनेगा। '
'तुमसे कुछ भी न बनेगा। '
'तो भी। '
'तो भी क्या कहूँ ?क्या तुम नहीं जानते होली या कोई भी त्यौहार वही मनाता है जो सुखी है। जिसके जीवन में किसी प्रकार का सुख ही नहीं ,वह त्यौहार भला किस बिरते पर मनाये ?'
'तो क्या तुमसे होली खेलने न आऊं ?'
'क्या करोगे आकर ?'
सकरुण दृष्टि से करुणा की ओर देखते हुए नरेश साइकिल उठाकर घर चल दिया। करुणा अपने घर के काम -काज में लग गयी।
2.
नरेश के जाने के आधे घंटे बाद ही करुणा के पति जगत प्रसाद ने घर में प्रवेश किया। उनकी ऑंखें लाल थीं। मुंह से तेज शराब की बू आ रही थी। जलती हुई सिगरेट को एक ओर फेंकते हुए वे कुर्सी खींचकर बैठ गए। भयभीत हिरनी की तरह पति की ओर देखते हुए करुणा ने पूँछा ,"दो दिन तक घर नहीं आये ,क्या कुछ तबियत खराब
थी ? यदि न आया करो तो खबर तो भिजवा दिया करो। मैं प्रतीक्षा में ही बैठी रहती हूँ।"
उन्होंने करुणा की बातों पर कुछ भी ध्यान न दिया। जेब से रुपये निकाल कर मेज पर ढेर लगाते हुए बोले ,
"पंडितानी जी की तरह रोज ही सीख दिया करती हो कि जुआ न खेलो ,शराब न पियो ,यह न करो ,वह न करो। यदि मैं जुआ न खेलता तो आज मुझे इतने रुपये इकट्ठे कहाँ से मिल जाते ? देखो पूरे पंद्रह सौ हैं। लो ,इन्हें उठाकर रखो ,पर मुझसे बिना पूँछे इसमें से एक पाई भी न खर्च करना। समझीं ?"
करुणा जुए में जीते हुए रुपयों को मिट्टी समझती थी। गरीबी से दिन काटना उसे स्वीकार था। परन्तु चरित्र को भ्रष्ट करके धनवान बनना उसे प्रिय न था। वह जगत प्रसाद से बहुत डरती थी इसलिए अपने स्वतंत्र विचार वह कभी भी प्रकट न कर सकती थी। उसे इसका अनुभव कई बार हो चुका था। अपने स्वतंत्र विचार प्रकट करने के लिए उसे कितना अपमान ,कितनी लांछना और कितना तिरस्कार सहना पड़ा था। यही कारण था कि आज भी वह अपने विचारों को अंदर ही अंदर दबाकर दबी हुई जबान से बोली ,"रुपया उठाकर तुम्हीं न रख दो ?मेरे हाथ तो आटे में भिने हैं।"
करुणा की इस इनकारी से जगत प्रसाद क्रोध से तिलमिला उठे और कड़ी आवाज से पूँछा ,"क्या कहा ?"
करुणा कुछ न बोली नीची नज़र किये हुए आटा सानती रही। इस चुप्पी से जगत प्रसाद का पारा एक सौ दस डिग्री तक पहुँच गया। क्रोध के आवेश में रुपये उठाकर उन्होंने फिर जेब में रख लिए। "यह तो मैं जानता ही था कि तुम यही करोगी। मैं तो समझा था कि इन दो-तीन दिनों में तुम्हारा दिमाग ठिकाने आ गया होगा। ऊट- पटांग बातें भूल गयी होंगी। परन्तु सोचना व्यर्थ था। तुम्हें अपनी विद्वता का घमंड है तो मुझे भी कुछ है। लो। जाता हूँ अब रहना सुख से। "कहते -कहते जगत प्रसाद कमरे से बाहर निकलने लगे।
पीछे से दौड़कर करुणा ने उनके कोट का सिरा पकड़ लिया और विनीत स्वर में बोली,"रोटी तो खा लो ,मैं रुपये रख लेती हूँ। क्यों नाराज होते हो ?"एक जोर के झटके के साथ कोट को छुड़ाकर जगत प्रसाद चल दिए। झटका लगने से करुणा पत्थर पर गिर पड़ी और सिर फट गया। खून की धारा बह चली और सारी जैकेट लाल हो गयी।
पीछे से दौड़कर करुणा ने उनके कोट का सिरा पकड़ लिया और विनीत स्वर में बोली,"रोटी तो खा लो ,मैं रुपये रख लेती हूँ। क्यों नाराज होते हो ?"एक जोर के झटके के साथ कोट को छुड़ाकर जगत प्रसाद चल दिए। झटका लगने से करुणा पत्थर पर गिर पड़ी और सिर फट गया। खून की धारा बह चली और सारी जैकेट लाल हो गयी।
3.
संध्या का समय था। पास ही बाबू भगवती प्रसाद जी के सामने वाली चौक से सुरीली आवाज आ रही थी।
"होली कैसे मनाऊं ?"
"सैंयाँ विदेश ,मैं द्वारे ठाढ़ी ,कर मल - मल पछताऊं। "
होली के दीवाने भांग के नशे में चूर थे। गाने वाली नर्तकी पर रुपयों की बौछार हो रही थी। जगत प्रसाद को अपनी दुखिया पत्नी का ख्याल भी न था। रुपया बरसाने वालों में उन्हीं का सबसे पहला नंबर था। इधर करुणा भूखी -प्यासी छटपटाती हुई चारपाई पर करवटें बदल रही थी।
" भाभी,दरवाजा खोलो ",किसी ने बाहर से आवाज दी। करुणा ने कष्ट के साथ उठकर दरवाजा खोल दिया। देखा तो सामने रंग की पिचकारी लिए हुए नरेश खड़ा था। हाथ से पिचकारी छूटकर पड़ी। उसने साश्चर्य पूंछा ,"भाभी यह क्या ?"
करुणा की आँखें छलछला आईं ,उसने रुँधे हुए कण्ठ से कहा ,"यही तो मेरी होली है ,भैया।"
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