मतदाता सूची को नागरिकता रजिस्टर बनाने की कवायद?
एसआईआर में 2003 क्यों महत्वपूर्ण है
एसआईआर के लिए साल 2003 क्यों महत्वपूर्ण है इसे समझने की कोशिश में जो जान पाया। 13 अक्टूबर 1999 से 22 मई 2004 तक देश में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी। साल 2003 में नागरिकता अधिनियम, 1955 में एक बड़ा संशोधन किया गया था। इसके तीन बेहद महत्वपूर्ण परिणाम हुए: (क) नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स (एनआरसी) को पहली बार कानून में शामिल किया गया। धारा 14ए जोड़ी गई और पहली बार कहा गया कि: भारत सरकार राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर बनाएगी। इससे पहले एनआरसी केवल असम जैसे मामलों में प्रशासनिक अभ्यास था, कानूनी रूप से पूरे देश के लिए नहीं।
(ख) नागरिकता “जन्म से” मिलने के नियम बदले। 2003 के संशोधन के बाद नियम यह हो गया कि 1 जुलाई 1987 से पहले पैदा हुए लोगों का भारत में जन्म हुआ हो तो वह नागरिक है। 1 जुलाई 1987 से 3 दिसम्बर 2004 के बीच पैदा हुए लोगों में माता-पिता में से किसी एक को नागरिक होना चाहिए। 3 दिसम्बर 2004 के बाद पैदा हुए लोगों के मामले में जरूरी है कि माता पिता में एक नागरिक हो और दूसरा अवैध प्रवासी न हो। इस तरह, 2003 के इस कानून के जरिए नागरिकता को वंश से जोड़कर सख़्त कर दिया गया। (ग) “अवैध प्रवासी” की परिभाषा भी जोड़ी गई। वैध प्रवासी को नागरिकता और मताधिकार से बाहर रखा गया है और एसआईआर का सारा झंझट इसी कारण है।
अब समझ में आया कि मेरी या 1970 से पहले पैदा हुए लोगों का 2003 का विवरण क्यों मांगा जा रहा है। इसके जरिए देखा जाएगा कि हमारे बच्चों को नागरिकता और मताधिकार देना है या नहीं। और नहीं देने का यह आसान उपाय है। इस तरह मतदाता सूची की शुद्धता का मतलब एक नाम कई बार होना या विदेशी की फोटो से नहीं, नागरिक होने से जुड़ गया है। वैसे तो एसआईआऱ 2003 के नियमों के अनुसार हो रहा है पर वो नियम बताए नहीं गए। योगेन्द्र यादव ने कहा है कि उसके अनुसार नहीं हो रहे हैं। बड़े पैमाने पर नाम कटने का मकसद जो हो कारण तो यह है ही। मुख्य चुनाव आयुक्त को कानून बनाकर सुरक्षा देने की जरूरत भी इसीलिए है क्योंकि कानून ही ऐसा है। इस तरह एसआईआर का मकसद नागरिकता जांच करना भी है। 2003 के संशोधन के बाद: नागरिकता जन्म से नहीं, माता-पिता / पति / पारिवारिक कड़ी से प्रमाणित मानी जाने लगी है। इसलिए केंचुआ या शासन पूछ रहा है - “आप या आपके पिता / पति / भाई / बहन 2003 में कहां के मतदाता थे?” कुल मिलाकर, कोशिश है कि मतदाता सूची को नागरिकता-अनुरूप बनाया जाए। एसआईआर के जरिए इस कानून को जमीनी स्तर पर लागू किया जा रहा है जो आधार बनाने के समय या उसके बाद अभी तक कभी भी किया जाना चाहिए था।
आप जानते हैं कि भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूनीक आईडेंटीफिकेशन अथॉरिटी ऑफ इंडिया या यूआईडीएआई की स्थापना 2009 में हुई थी। आधार के लिए नामांकन 2010 में शुरू हुआ था। आधार अधिनियम, 2016 में स्पष्ट कहा गया है कि आधार का उद्देश्य है “व्यक्ति की पहचान स्थापित करना है नागरिकता नहीं।” इसकी जरूरत का आधार यही हो सकता है कि टीएन शेषन जब भारत के चुनाव आयुक्त थे तो उन्होनों मतदाताओं के लिए पहचान पत्र जरूरी समझा था और मतदाता पहचान पत्र बने थे। आधार उसी का दोहराव है। अंतर सिर्फ यह कि 18 से कम वालों का भी आधार होगा वरना यह सिर्फ नागरिकों के लिए बनता या नागरिकता का प्रमाणपत्र होता। आधार की जरूरत उस समय भले महसूस की गई हो लेकिन तकनीक और डिजिटाइजेशन के जमाने में नागरिकों के लिए नौकरी और निवास के प्रमाणपत्र रहते हुए वोट देने से लेकर पैन कार्ड तक के बाद आधार या मतदाता प्रमाणपत्र की जरूरत नहीं है और इसपर बेकार खर्च हो रहा है। पर किसे परवाह है।
आधार को नागरिकता से नहीं जोड़ने का मुख्य कारण संविधान का अनुच्छेद 14 है जो “कानून के समक्ष समानता” — सभी व्यक्ति की, न कि केवल नागरिक की बात करता है। इसलिए, कानूनन सरकारी सेवाएँ जैसे, सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस), स्वास्थ्य, शिक्षा, मजदूरी भुगतान आदि नागरिक के साथ गैर-नागरिक (संभवतः नेपाली, वैध प्रवासी, शरणार्थी) — सभी के लिए होती हैं। इस तरह, कानूनन ये सब लोग सरकारी सुविधाओं का उपभोग कर सकते हैं लेकिन वोट नहीं दे सकते हैं और एसआईआर के जरिए कोशिश की जा रही है कि सरकार विशेष या विचारधारा विशेष के खिलाफ वोट देने वालों को बाहर कर दिया जाए। यूआईडीएआई की स्थापना भारत के सभी निवासियों को 'आधार' नामक एक विशिष्ट पहचान संख्या जारी करने के लिए की गई थी, ताकि दोहरी और फर्जी पहचान को खत्म किया जा सके और सब्सिडी, लाभ और सेवाओं का लक्षित और कुशल वितरण सुनिश्चित किया जा सके।
अगर निवासियों को विशिष्ट पहचान देने वाली इस संस्था को मतदाता सूची बनाने का काम दिया जाता तो काम का दोहराव नहीं होता, मतदाता सूची या एपिक कार्ड भी कायदे का होता। नाम पता ठीक लिखा होता और उसका उपयोग आधार की तरह भी किया जा सकता था। लेकिन एसआईआर जैसे हो रहा है उसके बाद आधार और जरूरी हो जाएगा। वैसे भी, आधार नामांकन के समय: कोई नागरिकता जाँच नहीं होती है, केवल पहचान और निवास की पुष्टि की जाती है। एसआईआर में 2003 में कहां थे के जरिए नागरिकता की ही पुष्टि हो रही है। बाकी सब तकनीकी मामला हो सकता है। आधार नामांकन “स्वघोषित और परिचयकर्ता आधारित” था। मतदाता सूची में नाम के लिए यह सुविधा नहीं है फिर भी वह नागरिकता का प्रमाणपत्र है कि नहीं – पता नहीं, बाद में पता चलेगा।
इसका कारण यही था कि शुरुआती वर्षों में बहुत से लोगों के पास जन्म प्रमाणपत्र नहीं थे। यही स्थिति मतदाता सूची या एसआईआर के मामले में अभी भी है। इस तरह और इसके बाद भी सुप्रीम कोर्ट के आदेश के कारण आधार का उपयोग नागरिकता निर्धारित करने में नहीं किया जा सकता है लेकिन मतदाता नहीं बनाने के लिए अब ढेरों उपाय हो गए हैं। अगर आधार होने का मतलब नागरिक होना होता तो करोड़ों आधार धारकों की नागरिकता अपने आप मान ली जाती। फिर उन्हें हटाना लगभग असंभव होता। दूसरी ओर, अभी जिसे बांग्लादेश भेज दिया गया उसे वापस लाया गया है। तबकी सरकार ने नागरिकता का प्रश्न अलग कानूनों पर छोड़ा लेकिन मतदाता बनाने में कानून के उल्लंघन की खबर महत्वपूर्ण नहीं है। आधार पहचान और निवास प्रमाणित करता है जबकि वोटर आई कार्ड मताधिकार (या केवल नागरिक) होना प्रमाणित करता है।
पासपोर्ट नागरिकता का मजबूत प्रमाण है लेकिन राहुल गांधी के पास सब होने के बाद भी उनकी ब्रिटिश नागरिकता की जांच यहां होगी या उन्हें भारतीय नागरिक नहीं मानने के लिए यहां की अदालतों में अपील हो सकती है।

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