सुप्रीमकोर्ट का अहम् फैसला !! अब कोटे में भी कोटा !!
SC के फैसले से इन राज्यों में होगा नई राजनीति का उभार .
सुप्रीम कोर्ट की सात जजों की बेंच ने 6:1 के बहुमत से फैसला देते हुए कहा कि अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) में कोटे के अंदर कोटा बनाकर आरक्षण दिया जा सकता है. ऐसे में समझते हैं कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का राज्यों की सियासत पर क्या असर हो सकता है? और अलग-अलग राज्यों में दलित - आदिवासी को कोटे में भी कोटे का निर्धारण करने का निर्णय सुप्रीमकोर्ट के द्वारा लिया गया है .
और अलग-अलग राज्यों में दलित-आदिवासियों की आबादी कितनी है?
देश में अभी अनुसूचित जाति (एससी) को 15% और अनुसूचित जनजाति (एसटी) को 7.5% आरक्षण मिलता है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद एससी और एसटी की जातियों के अन्दर जो भी उप जातियां हैं उन्हें भी आरक्षण देने का आदेश सुप्रीम कोर्ट ने दिया है .
अगर कोई राज्य किसी जाति को कोटे के अंदर कोटा देती है तो उसे साबित करना होगा कि ऐसा पिछड़ेपन के आधार पर ही किया गया है. ये भी देखा जाएगा कि किसी sc/st कुल आरक्षण का उसके किसी एक वर्ग विशेष को ही न दे दिया जाय .
इस फैसले का राजनैतिक असर :
भारतीय राजनीति में जातिगत भावनाएं बहुत ज्यादा मायने रखती हैं . देखा जाए तो पूरे भारत में जातियों की ही बात होती रहती हैं. अभी कुछ दिन पहले अन्य पिछड़ा वर्गों के आरक्षण की राजनीति चल रही थी किन्तु अभी फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अब अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के विषय में राजनीति के अखाड़े गरमा गए हैं .
ऐसा माना जा रहा है कि अब दलित एवं आदिवासी समूह एक नहीं रह जाएगा . उसके अन्दर ही अन्दर कई समूह खड़े हो जायेंगे . अलग अलग राज्यों की राजनितिक पार्टिया दलित एवं आदिवासियों की राजनीति करती हैं . सुप्रीम कोर्ट के फैसले से यहां सियासत में बड़े बदलाव दिख सकते हैं और यहां एससी-एसटी के अलग-अलग वर्गों के अलग-अलग राजनीतिक नेतृत्व उभर सकते हैं.
किस किस राज्य में कितने दलित-आदिवासी ?
उत्तर प्रदेशः पूरे राज्य में दलित, जाटव और गैर-जाटव में बंटे हुए हैं. कुल आबादी में 12% जाटव और 10% गैर जाटव हैं. दलितों की कुल आबादी में 56 % जाटव ही हैं.
जाटवों के अलावा दलितों की बाकी उपजातियों में पासी 16 फीसदी, धोबी, कोरी और वाल्मीकि 15 फीसदी और गोंड, धानुक और खटीक करीब 5 फीसदी हैं. वहीं, गैर-जाटव दलितों में वाल्मीकि, खटिक, पासी, धोबी और कोरी समेत तमाम उपजातियां हैं.
इस प्रकार अब अनुसूचित एवं अनुसूचित जनजातियों में उपजातियों को खोजकर उन्हें भी आरक्षण के दायरे लाया जाएगा . जिन अनुसूचित जातियों को एक बार आरक्षण का लाभ मिल चूका होगा उनको छांटकर क्रिमिलयेर की तरह आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की व्यवस्था देने का आदेश सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिया गया है .
इस प्रकार से यह संकेत सुप्रीम कोर्ट ने दे दिया दिया है कि जातिगत आरक्षण को समाप्त कर आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की व्यवस्था की जानी चाहिए .
यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के 7 जजों की खंडपीठ ने 6-1 से सुनाया . जिसमे सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डी. वाई . चन्द्रचूड भी शामिल हैं .
देखिये आगे क्या होता है . विभिन्न जातियां मिलकर आन्दोलन का रुख अपनाती हैं या सर्कार के नजरिये का इंतज़ार करती हैं . यह मामला अभी भविष्य के गर्त में छुपा हुआ है .
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