बात कड़वी है किन्तु सत्य है। क्या? आइए विश्लेषण किया जाय।

 कड़वी है किन्तु सत्य है। क्या? आइए विश्लेषण किया जाय।



बधाई हो !! 

तंत्र ने अपने अथक प्रयास से यह मकाम हासिल किया कि आप सभी लोग सोच रहे हैं की चाहे कुछ हो जाए अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में नहीं पढ़ाना।  

इसमें किसी एक सरकार या शिक्षक का सहयोग नहीं है सभी की भागीदारी है । किसी के समय में यह कुचक्र प्रारंभ हुआ था और कोई किसी ने उसकी गति बड़ा कर खत्म कर रहा है ।


#सरकारी_स्कूलों ' में एडमिशन न होना इस बात का सूचक है की ' सरकार' और 'शिक्षक' दोनों असफल हो गयें हैं ।


कहते हैं सरकार सरकारी शिक्षकों से पढ़ाई के अलावा सब कुछ करवाता है उन पर काम का दबाव अधिक होता है लेकिन ऐसा भी नहीं है कि वह दबाव सदैव होता है । कुछ श्रेय हमें इनकी कामचोरी और हमामखोरी को भी देना चाहिए , वह गैरजिम्मेदाराना रबैया जो लगभग सभी की नसों में बस गया है ।


लोग सरकारी शिक्षक बनना तो चाहते हैं लेकिन पढ़ाने के लिए नहीं । इसमें किसी एक को दोष नहीं दिया जा सकता । यह पीढ़ी दर पीढ़ी से अर्जित की गई मक्कारी ही है जिसकी कीमत पीढ़ी दर पीढ़ी सभी भुक्तेंगे । 

जब सरकारी स्कूलों में बच्चे ही नहीं रहेंगे तब सरकारी शिक्षकों की आवश्यकता क्या होगी ?


बहाना यह भी दिया जाता है की सरकार अन्य कामों का दबाव डालती है और बच्चे पढ़ना ही नहीं चाहते या अभिभावक खुद बच्चों को अच्छे से नहीं पड़ना चाहते । 

अगर उन्हें शिक्षा का इतना ही महत्व पता होता तो वह इस सामाजिक और आर्थिक स्थिति में होते ही क्यों ?


अभी ऐसा विष चक्र प्रारंभ होने वाला है जिसका अंत करना करने की आत्मशक्ति शायद ही किसी सरकार में होगी । 


अब शिक्षा सिर्फ पैसे वालों के लिए होगी और शिक्षा की गुणवत्ता सिर्फ उन लोगों के लिए होगी जो शिक्षा का महत्व समझते हैं । 


 शिक्षा सिर्फ कक्षाओं को पास करना और डिग्रियां हासिल करना नहीं है । 


'शिक्षा योग्यता, सोचने की क्षमता और मानसिक विकास का नाम है।'


इसके लिए किसी एक को जिम्मेदार ठहरना अनुचित होगा । इसकी संपूर्ण जिम्मेदारी उस विचारधारा को जाती है जो सभी धाराओं को पूंजीवाद की ओर मोङती है और जो धाराएं पूंजीवाद के अनुरूप नहीं होती है उन्हें मिटा देती है । 

सामाजिक (सरकारी) क्षेत्र में शिक्षा और स्वास्थ्य के ढांचे का विध्वंस होना उसका मात्र एक नमूना है । यह बात हमें अपने व्यक्तिगत जीवन में भी देखने को मिलेगी कि पूंजीवाद अब हमारी रगों में दौड़ रहा है । 

किस तरह यदि हमें कोई चीज नहीं खरीद पाते हैं तो हम आत्मग्लानी से भर जाते हैं । हमारी आत्म शक्ति खरीदने की क्षमता पर निर्भर करने लगी है । यह पूंजीवाद का विकराल स्वरूप नहीं है तो और क्या है ? 


अब समाज के हर वर्ग में पैसे की दौड़ और बढ़ेगी । लोग हर हाल में अपने बच्चों की फीस इकट्ठा करने की कोशिश करेंगे , जिससे नैतिकता और मानवता दोनों का बहुत तेज गति से ह्रास होगा क्योंकि चाहे कुछ हो जाए एक माता-पिता अपने बच्चों के लिए कुछ भी करता है और इसके लिए कहीं ना कहीं सरकार और समाज दोनों जिम्मेदार होंगे ।


सरकारी स्कूल में एडमिशन न होना चिंता और दुख का विषय है । लेकिन इसमें एक अच्छी संभावना मुझे मात्र यह दिखती है कि शायद ,शायद अब भारत का माध्यम और निम्न वर्ग पैसे देकर शिक्षा के महत्व को समझेगा , शिक्षा की गुणवत्ता पर ध्यान देगा ।


भारत का ऐसा बहुत बड़ा हिस्सा है जो शायद अभी अपनी पहली या दूसरी पीढ़ी ही शिक्षा ग्रहण कर रही है । उनमें शिक्षा के प्रति उतनी जागरूकता और शिक्षा के महत्व का उतनी समझ नहीं है । इसका खामियाजा उन्हें निश्चित रूप से देना पड़ेगा क्योंकि इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि आप सरकारी स्कूल में पढ़ रहे हैं या प्राइवेट में , यदि अभिभावक शिक्षा का महत्व नहीं समझता तो बच्चे को व्यक्तिगत स्तर पर बहुत अधिक मेहनत करनी होती है जो एक बच्चों से इतनी उम्मीद करना बचकाना है ।


80% जनसंख्या की शिक्षा और की शिक्षा की गुणवत्ता और स्थिति खराब होने के बावजूद भी भारत का भविष्य उज्जवल रहेगा क्योंकि वह 20% लोग जो पीढ़ियों से शिक्षा में अग्रणी है , संसाधन संपन्न है भारत को संभाले रहेंगे । 

पर इसे हम 'संपूर्ण भारत' का विकास नहीं कह सकते ।


"जय हिंद"

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