क्या आपको भी नींद नहीं आती है?


क्या आपको भी नींद नहीं आती है?

■ सुबह की शानदार शुरूआत तभी हो सकती है जब रात को चैन भरी नींद आये। लेकिन ये सुख सबको मुकम्मल नहीं है, क्योंकि सुबह आलस और थकान के साथ होती है। तनाव और काम के बोझ के कारण ये लोग रात में ठीक से सो नहीं पाते है।


ये समस्या आजकल के युवाओं में अधिक देखी जा रही है। सुकून भरी नींद के लिए आजकल युवाओं ने और खासकर महिलाओं ने स्लीपिंग पिल्स को स्टेटस सिंबल बना लिया है। इसी तर्ज पे डाइजेपाम, अल्प्राजोलम, क्लोनज़ेपाम, बाजार से खरीद कर मनमाने ढंग से खाने वाली एक पीढ़ी बाकायदा तैयार हो चुकी है।


जिस तरह थायरॉइड की गोलियों में थायरोक्सिन, शुगर की गोलियों मे इंसुलिन वैसे ही नींद की गोलियों में एक खास तरह का हॉर्मोन होता है।


नाम सुना होगा आपने ?? शायद नही !! क्यों ?? क्योंकि आपने मेडिकल साइंस नही पढ़ी !! क्योंकि आपने ब्रेन की एनाटोमी नही पढ़ी ! एनाटोमी के साथ फिजियोलॉजी नही पढ़ी !! आपने फ़्रांसीसी दार्शनिक रेने देकार्ते को नही पढ़ा !! वो कहते थे कि पिनियल ग्रन्थि आत्मा की पीठिका ( सीट ऑफ़ सोल ) है : वह स्थान जहाँ मनुष्य की आत्मा वास करती है। 


कौनसा है वह स्थान ? वो स्थान है पीनियल ग्रन्थि !! पीनियल ग्रन्थि मस्तिष्क की गहराई में स्थित है। इसका काम एक हॉर्मोन मेलाटोनिन बनाना है।


अब क्या है ये मेलोटोनिन ? ये वही हॉर्मोन है जो स्लीपिंग पिल्स में होता है या वही हॉर्मोन जो आपको नींद दिलाने में हेल्प करता है।


मेलाटोनिन एक ऐसा हार्मोन है जिसकी भूमिका हमारी दैनन्दिन जैविक घड़ी के क्रम ( बायोलॉजिकल सर्केडियन रिद्म ) को बनाये रखने में है। जो सामान्य तौर पर रात के वक्त नियमित नींद के लिए शरीर में स्वतः स्रावित होता है। यह दिमाग की पिनियल ग्रंथि से स्रावित होता है। कब सोना है और कब उठना : यह मनुष्य केवल चाह कर पूरी तरह तय नहीं कर सकता। कई बार इसका निर्णय व्यक्ति के जीन और मम्मी की स्नेहिल पुकार और घड़ी के अलार्म दोनों तय करते हैं। जल्दी सोना सबके लिए सम्भव नहीं, जल्दी उठना भी। 


हम मनुष्यों में दिन में मेलाटोनिन का स्तर घट जाता है और रात में इसमें वृद्धि हो जाती है। दिन में जो भी जीव-प्रजातियाँ सक्रिय पायी जाती हैं, जिनमें मनुष्य भी शामिल हैं मेलाटोनिन का मस्तिष्क और रक्त में घटा स्तर लिये चलते हैं। रात्रिचर जीवों में उलटा होता है उनमें मेलाटोनिन स्तर रात में कम और दिन में अधिक पाया जाता है। 


लेकिन जब हमारी दिनचर्या अनियमित होती है और दिमाग पर तनाव और अवसाद अधिक प्रभावी हो जाता है तब इस हार्मोन का स्राव कम हो जाता है। परिणामस्वरूप नींद हमसे दूर जाने लगती है। लेकिन यह व्यवहार पूरी तरह से केवल आधुनिक जीवनचर्या में बदलाव के कारण ही नहीं है : कई जीन ऐसे हैं , जिनके कारण व्यक्ति चाह करके भी अपने सोने-जगने का समय पूरी तरह तब्दील नहीं कर पाता। 


आप प्रोटीन खाते हैं, वे अमीनो अम्लों से बने हैं। इन्हीं में एक अमीनो अम्ल ट्रिप्टोफ़ैन है। इसे शरीर की पीनियल ग्रन्थि लेती है और इससे सेरोटोनिन नामक एक रसायन बनाती है। सेरोटोनिन को फिर यह मेलाटोनिन में बदल देती है जो हमारी दैनन्दिन घड़ी को नियन्त्रित करता है। 


मेलाटोनिन का मस्तिष्क व रक्त में स्तर केवल दिन-रात के आधार पर नहीं तय होता, कई अन्य कारण भी भूमिका निभाते हैं। स्त्री-पुरुष (लिंग), बालक-युवा-वृद्ध (वय), ग्रीष्म-शीत (ऋतु) और अन्य परिस्थियाँ भी मेलाटोनिन स्तर तय करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उम्र बढ़ने के साथ मेलाटोनिन का यह स्तर घटता जाता है। जाड़ों में रातें लम्बी होती है इसलिए इस मौसम में मेलाटोनिन स्तर गर्मी की तुलना में बढ़ जाता है। 


अब मान लीजिए रात का समय है। लेकिन आपके मस्तिष्क में मेलाटोनिन का स्तर नहीं बढ़ा या देर से बढ़ा। तो ऐसे में आप जल्दी नहीं सो सकेंगे ; आपको नींद आने में देर होगी। यह नींद का फेज़शिफ़्ट-सिद्धान्त है, जिसके अनुसार आपके शरीर में नींद के उचित समय पर मेलाटोनिन का स्तर नहीं बढ़ रहा। 


मेलाटोनिन का तरह-तरह के अनिद्रा-रोगियों में दवा के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है। अनिद्रा के कारण व कारक कई हैं, कोई एक फ़ॉर्मूला तो इसे ठीक करने का है नहीं। ऐसे में मेलाटोनिन अनेक उपचारों में से एक कारगर उपचार है। जिन लोगों को रात की ड्यूटी करनी है, उनके लिए दिन में सोना ज़रूरी है। जिन्हें अन्तरराष्ट्रीय हवाई यात्राएँ करनी है, उन्हें जेटलैग से मुक़ाबला करना है। इनके सेवन से नींद से जुड़ी अनियमितता को दूर किया जा सकता है।


ऐसे में मेलाटोनिन के स्तर को बढ़ाने के लिए बाजार में मेलाटोनिन सप्लीमेंट मिलते हैं। इन सभी परिस्थितियों में मेलाटोनिन का प्रयोग डॉक्टर की राय से किया जा सकता है। 


सुकून भरी नींद अगर आपको नैचुरली नहीं मिल रही है और इसके लिए आप मेलोटॉनिन का सेवन कर रहे हैं तो इसके कुछ साइड इफेक्ट भी हो सकते हैं। हम लोग को भी इसको पर्चे में लिखना है कि नही या किस कम्बीनेशन का देना है, किस रोग में कौनसा देना है, मनमाने ढंग से ली/दी गई ऐसी दवाइयां शरीर के ढेरों अंगों को हानि पहुँचा सकती हैं और मेडिकल-साइंस में ऐसा न करने की स्पष्ट हिदायतें हैं। 


अमेरिका के फूड और ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन द्वारा किये गये शोध की मानें तो इसके अधिक सेवन से एलर्जी की समस्या हो सकती है। स्पेन में मेलाटोनिन के प्रभाव को लेकर शोध किया गया। इस शोध का परिणाम संतोषजनक नहीं था। दरअसल मेलाटोनिन दिमाग से जुड़ा हार्मोन है, ऐसे में इसकी कमी या अधिकता के कारण तनाव, थकान, प्रतिरोधक क्षमता में कमी, आदि की समस्या होने लगती है। शोध की मानें तो अगर कोई इंसान इस सप्लीमेंट का अधिक प्रयोग करता है तो इसके कारण उनींदापन, सिर दर्द, या याद्दाश्त कमजोर होने जैसी समस्या हो सकती है।


कुल मिलाकर इस सप्लींमेंट का सेवन उचित है या अनुचित, इसपर अभी तक कोई भी रिसर्च निश्चित परिणाम नहीं दे पाया है। इसलिए अगर आपको अच्छी नींद नहीं आ रही है तो अपनी दिनचर्या को बदलें। समय का पालन करें और कुछ दिनों तक तकनीक से दूर रहें। नियमित व्यायाम करें और स्वस्थ खानपान अपनायें।


देकार्ते अगर आज जीवित होते, तो कहते कि आत्मा का निवास नींद के बिस्तर पर है। आत्मा जब तक सोएगी नहीं, वह सर्जना नहीं कर सकेगी। मेलाटोनिन उसी निद्रा-शैया को सजाता है : वह आत्मा के शयन का प्रबन्धक है।


👉 और अंत में आर्टिकल को विराम देते हुए एक ही बात कहना है कि ! आप अपना स्ट्रेस प्रबंधन कर लो 😠 एलोपैथी से लाख गुना बेहतर आयुर्वेद है इसकी शरण में आ जाओ नहीं तो....

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