क्या आप शोले वाली मौसी को जानते हैं?
आइये कुछ खट्टी-मीठी यादों को दोहराया जाय।
लीला मिश्रा, खांटी मौसी
बहुत कम आर्टिस्ट हुए हैं जो किसी भी किरदार में रहे मगर उन्होंने अपना मूल गंवई अंदाज़ नहीं छोड़ा। हमेशा ज़मीन से जुड़े रहे। कन्हैयालाल के साथ-साथ लीला मिश्रा भी ऐसी ही आर्टिस्ट रहीीं। याद करिये, 'शोले' की मौसी को जिन्हें बसंती (हेमा मालिनी) की शादी के लिए सुयोग्य वर की तलाश में है और जय (अमिताभ बच्चन) लफंट वीरू (धर्मेंद्र) का रिश्ता लेकर जाता है । लेकिन मौसी तैयार नहीं होती हैं। वीरु टंकी से कूद कर आत्महत्या की धमकी देता है तो मौसी तैयार होती है।
'राम और श्याम' में दिलीप वाले श्याम को उन्होंने मां बन कर पाला है तो 'बहू-बेगम' में वो क़रीबन बुआ हैं और ज़ीनत (मीना कुमारी) का हर वक़्त ख्याल रखती हैं ।
'प्यासा' में वो गुरूदत्त की मां हैं जिसे बेटे की बहुत फ़िक्र रहती है तो 'अमर प्रेम' में वो कहने को कोठे वाली मौसी है परंतु सहृदय हैं और पुष्पा (शर्मिला टैगोर) को बहुत मान देती हैं ।
'तुमसे अच्छा कौन है' में वो लीक से हट कर बॉब हेयर वाली सिंधी भाषी हैं और ज़िद्द पर अड़ी हैं कि बेटी शीला (शोभा खोटे) की शादी सिंधी से ही होगी जबकि पति धूमल मराठी वर तलाश कर रहे होते हैं। 'बातों बातों में' वो पारसी फिलोमिना आंटी हैं जो अक्सर रोज़ी परेरा (पर्ल पदमसी) के घर टपक पड़ती हैं, लेकिन उन्हें नैंसी (टीना मुनीम) का प्रेमी टोनी (अमोल पालेकर) कतई पसंद नहीं है क्योंकि उसका वेतन बहुत कम है.
'दुश्मन' में दुखियारी अंधी मां हैं जिसके बेटे को सुरजीत (राजेश खन्ना) के ट्रक ने कुचल दिया है। ऐसे ही अनेक भिन्न-भिन्न किरदार करने के बावजूद लीला मिश्रा अपना प्राकृतिक खांटी अंदाज़ नहीं छोड़ती हैं। वैसे ज़्यादातर उन्होंने माँ या मौसी के किरदार ही किये हैं, मानो उनके लिए किरदार क्रिएट किये गए। जब किसी निर्माता - निर्देशक को ज़मीनी मौसी की ज़रूरत पड़ी फ़ौरन ही लीला मिश्रा का दरवाज़ा खटखटा दिया।
लीला मिश्रा ने दो सौ से ज़्यादा फ़िल्में कीं। 1 जनवरी 1908 में जन्मी लीला मिश्रा की फिल्मों में एंट्री काफी ड्रामेटिक रही। उनके पति राम प्रसाद मिश्रा बनारस के थे और वो रायबरेली के जायस की। दोनों ही ज़मींदार घराने के थे । पैसे की कमी नहीं रही, मगर परिवार में नाच-गाने की सख़्त पाबंदी के विपरीत राम प्रसाद को बंबई जाकर कमाने की धुन सवार थी ।
लीला मिश्रा जब बारह साल की थीं तब उनकी शादी हुई थी । सत्रह की होते-होते दो लड़कियों की माँ बन गयीं। रामप्रसाद का बनारस से बंबई आना-जाना लगा रहता था । वो आधुनिक विचारों के थे । पत्नी लीला को भी बंबई ले आये, ये कह कर कि वहां मेरा ख्याल रखेगी । ये बात 1934 की है। सिनेमा मूक एरा से निकल कर टॉकी एरा में प्रवेश कर रहा था। रामप्रसाद फ़िल्मों में छोटे-मोटे रोल करके जैसे-तैसे घर चला रहे थे ।
उन्हीं दिनों दादासाहेब फाल्के की नासिक फिल्म कंपनी से जुड़े मामा शिंदे के सुझाव पर रामप्रसाद ने पत्नी लीला को फिल्मों के लिए तैयार किया । लीला ने कहा," मुझ देहातन को फिल्मों का ' क ख ग ' भ नहीं आता है मैं एक्टिंग कैसे कर पाऊँगी।" मगर जब उन्होंने कॉन्ट्रेक्ट देखा तो आँखें खुली की खुली रह गयीं। राम प्रसाद को डेढ़ सौ रूपये प्रतिमाह वेतन और लीला को पाँच सौ।
दरअसल, उन दिनों स्त्रियों का सिनेमा में अकाल होता था, इसलिए उनकी अहमियत पुरुष कलाकारों से ज़्यादा थी। बहरहाल, वो फिल्म थी- सती सुलोचना। राम प्रसाद रावण थे और लीला मंदोदरी । लेकिन कैमरे के सामने दोनों घबरा गए। नतीजा कॉन्ट्रैक्ट कैंसिल हो गया। मगर किस्मत उनके साथ थी। महाराजा ऑफ़ कोल्हापुर ने 'भिखारिन' में दोनों को लिया । मगर यहाँ से भी उन्हें निकाल दिया गया।
हुआ ये था कि लीला को हीरो के कंधे पर हाथ रख कर कहना था, " मैं तुम्हारे बिना ज़िंदा नहीं रह सकती।" लीला भड़क गयीं । हाय! पति के होते हुए किसी ग़ैर मर्द को ऐसा मैं कैसे बोल सकती हूँ ?
लेकिन लीला की डिमांड बनी रही। फिल्म इंडस्ट्री में स्त्रियों का अकाल था। उन्हें 'गंगा अवतरण' में पार्वती का रोल मिला। इसमें उन्हें कोई परेशानी नहीं हुई, पर पुरुष को छूना नहीं था । ये फ़िल्म सुपर हिट हुई। श्रद्धालुओं की भारत में किसी भी युग में कभी कमी नहीं रही। मगर अगली फिल्म 'होनहार' में लीला फिर भड़क गयीं। निर्माता गजानंद जागीरदार ने उन्हें हीरो साहू मोदक के गले से लगने को कहा गया। लीला ने साफ़ मना कर दिया, भला पराये मर्द से क्यों चिपटूं ? स्थिति गंभीर हो गयी। कानूनी तौर पर कंपनी उनका कॉन्ट्रैक्ट रद्द नहीं कर सकती थी, ऊपर से स्त्री कलाकारों की कमी। तय हुआ कि लीला को साहू मोदक की मां बना दिया जाय। बस उस दिन के बाद से लीला मिश्रा आयुपर्यंत माँ-मौसी के किरदार करती रहीं। पब्लिक भी उन्हें मौसी ही कहती थी.
लीला मिश्रा ने चित्रलेखा, अनमोल घड़ी, शीश महल, आवारा, दाग, आंधियां, शिकस्त, लाजवंती, गंगा मैया तोहरे पियरी चढ़इबो, ससुराल, लीडर, दोस्ती, धरती कहे पुकार के, परिचय, सौदागर, संतोषी मां, गीत गाता चल, बैराग, महबूबा, पलकों की छांव में, सावन को आने दो, चश्मे बद्दूर, कथा, सदमा आदि में यादगार रोल किये।
1981 में बनी 'नानी मां' के लिए उनकी नेचुरल एक्टिंग के दृष्टिगत मास्को फिल्म फेस्टिवल में बेस्ट एक्ट्रेस और बेस्ट कॉमेडियन का अवार्ड मिला. लेकिन लीला को इनामों का कभी मोह नहीं रहा। वो अपनी फ़िल्में भी नहीं देखती थीं। उनके मिलने वाले उनकी एक्टिंग की प्रशंसा करते नहीं अघाते थे. उनसे कहते थे- " सिनेमा हाल जाकर एक बार अपने को पर्दे पर देख तो आओ।" लेकिन लीला कहती थीं, क्यों पैसा बर्बाद करूँ? वो घर में ही घुसी रहती थीं, दुनिया से अलग । काम किया और घर लौट आयीं। उन्हें सिर्फ़ अच्छे खाने और पड़ोसियों से बतियाने का शौक रहा। घर की दीवार पर सिर्फ एक तस्वीर टंगी रही, भगवान शिव की। एक विचित्र आदत थी उनकी। वो कलाकारों के चेहरे याद नहीं रख पाती थीं.
'आँचल' के सेट पर उन्हें बताया गया कि ये मशहूर एक्ट्रेस रेखा है, तब उन्होंने पहचाना । बताते हैं, 'दुश्मन' की शूटिंग के दौरान राजेश खन्ना को उनके लेट आने की आदत के कारण वो उन्हें बहुत बुरा-भला कह रही थीं। किसी ने बताया उनके बगल में बैठा बंदा राजेश खन्ना है। तमाम श्रेष्ठ डायरेक्टर्स के साथ उन्होंने काम किया। किसी को उनसे कोई परेशानी नहीं हुई और न उन्हें किसी से।
'शतरंज के खिलाड़ी' में लीजेंड 'सत्यजीत रे' के दिल को लीला मिश्रा की सादगी और उनका डाउन टू अर्थ स्वभाव भा गया। उन्होंने कहा, " मौसी बांगला सीख लो और कलकत्ते आ जाओ, मेरे साथ काम करो।" कोई और होता तो ऐसा ऑफर लपक लेता, किन्तु लीला ने मना कर दिया। "इत्ती दूर कलकत्ते नहीं जाऊंगी, बंबई आकर शूटिंग करो।" रे ने 'हाँ' कर दी। मगर वो दिन कभी नहीं आया।
17 जनवरी 1988 को 81 साल की लीला को दिल का दौरा पड़ा और वो हमेशा के लिए खामोश हो गयीं। लेकिन आज भी हर समय उनकी याद दिल को जब-तब गुदगुदाती है। जब उनके जैसी कोई खांटी वृद्धा दिखती हैं या फिर जब हम गोल्डन 'एरा' की फ़िल्में दिखाने वाले चैनल को देख रहे होते हैं।
"जुआरी हो, शराबी हो-मगर उसमें कोई दोष नहीं हैं।"
मौसी आप हमेशा सबके दिलों में छाई रहोगी।
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