घर मम्मी का भी है (लघु कथा)

घर मम्मी का भी है ( लघु कथा ) दिल को छू लेने वाली कहानी।  

जब मन उदास होता माँ की फोटो पर्स से निकालकर माँ से घंटों बातें करती। कभी समस्या  का हल मिल जाता ,कभी नहीं भी मिलता , पर उनसे बात करके मन हल्का हो जाता। मैं एक दिन बच्चों को पढ़ा रही थी। एक कविता में दादा -दादी , नाना  - नानी की बात आयी। रेनसां ने मेरी ऒर प्रश्नसूचक निगाहों से देखते हुए कहा -
"मम्मा ,घर में दादा - दादी की फोटो तो है ,पर नाना - नानी की नहीं। क्यों? उसकी बात सुनकर रोहन जोर - जोर से हसने लगा और बोला - "बुद्धू ,तुझे इतना भी नहीं  पता।  ये घर तो पापा  है ना......तो पापा के मम्मी - पापा की फोटो ही तो लगेगी ना ! क्यूँ पापा ? "पास ही बैठे  पति देव ने मेरी ओर देखते हुए कहा -"जितना ये घर मेरा है , उतना ही तुम्हारी मम्मी का भी  है। "
इतना कहकर वह उठकर जाने लगे।  मैंने पूंछा , " कहाँ चल दिए एकदम से। बच्चों का सवाल वाजिब है , तो जवाब भी तो वाजिब ही होना चाहिए  ना ! तुम मम्मी - पापा की अच्छी सी फोटो निकाल दो ,मैं आज ही फ्रेम करवा लाता हूँ ! अब दीवार पर सिर्फ दादा - दादी नहीं ,नाना - नानी की फोटो भी होगी।  " उन्होंने जवाब दिया।  यह सुनते ही रैनसा रोहन को चिढ़ाकर बोली - 
" भाई , ये घर पापा का ही नहीं , मम्मी - पापा दोनों का है। 

                                                                                                               

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