कैंसर का इलाज=========सुबह में पाँच तुलसी के पत्ते खायें। एक-एक घण्टे के अंतर से एक-एक पत्ता मुँह में रखें। 50 ग्राम ताजे दही में 10 ग्राम तुलसी का रस मिलाकर दिन में दो तीन बार लें।
> सफेद पुनर्नवा की 10 ग्राम जड़ एवं बरना की 10 ग्राम जड़ एवं 10 ग्राम आम्बा हल्दी को 400 मि.ली. पानी में लेकर उसका 50 मि.ली. काढ़ा करके पीने से कैंसर की कच्ची गाँठें पिघल जाती हैं।
> हरड़, सेंधा नमक एवं धावई के फूल समान मात्रा में लेकर चूर्ण बनाकर 2 से 5 ग्राम चूर्ण शहद के साथ लेने से कैंसर में लाभ होता है।
>कैंसर की रोकथाम, दूषित खून की सफाई, डिमेंशिया से छुटकारा, गठिया, हानिकारक बेक्टीरिया और वायरस का सफाया, रोगों से लडऩे की क्षमता में इजाफा ....जैसे कई नायाब गुणों के साथ ही हल्दी में एक अन्य विशेष खूबी भी पाई जाती है। यदि कभी किसी को कोई चोट-मोच या जर्क लग जाए तथा दर्द, जकडऩ और सूजन की तकलीफ हो रही हो तो ऐसे में हल्दी का यह प्रयोग अवश्य करना चाहिये।
प्रयोग: चार चम्मच संरसों के तेल में 1चम्मच पिसी हल्दी लेकर धीमी आंच पर पका लें, इसमें 4-5 कलियां लहसुन की भी डाल दी जाएं तो लाभ और भी जल्दी होता है। थोड़ा ठंडा या गुनगना रहने पर किसी साफ कॉटन के साथ इस तेल में पकी हुई हल्दी को चोट के स्थान पर लगाकर बांध लें। कुछ ही घंटों में चोट और सूजन में काफी लाभ होगा।दूध के साथ प्रयोग: दो-तीन दिन लगातार दूध मे 1-चम्मच हल्दी पावडर डालकर पीने से भी चोट-मोच, दर्द और सूजन में तत्काल राहत मिलती है।
कैंसर में गेहूँ के ज्वारे
गेहूँ के बोने पर जो एक ही पत्ता उगकर ऊपर आता है उसे ज्वारा कहा जाता है। नवरात्रि आदि उत्सवों में यह घर-घर में छोटे-छोटे मिट्टी के पात्रों में मिट्टी डालकर बोया जाता है।
गेहूँ के ज्वारे का रस, प्रकृति के गर्भ में छिपी औषधियों के अक्षय भंडार में से मानव को प्राप्त एक अनुपम भेंट है। शरीर के आरोग्यार्थ यह रस इतना अधिक उपयोगी सिद्ध हुआ है कि विदेशी जीववैज्ञानिकों ने इसे 'हरा लहू' (Green Blood) कहकर सम्मानित किया है। डॉ. एन. विगमोर नामक एक विदेशी महिला ने गेहूँ के कोमल ज्वारों के रस से अनेक असाध्य रोगों को मिटाने के सफल प्रयोग किये हैं। उपरोक्त ज्वारों के रस द्वारा उपचार से 350 से अधिक रोग मिटाने के आश्चर्यजनक परिणाम देखने में आये हैं। जीव-वनस्पति शास्त्र में यह प्रयोग बहुत मूल्यवान है।
गेहूँ के ज्वारों के रस में रोगों के उन्मूलन की एक विचित्र शक्ति विद्यमान है। शरीर के लिए यह एक शक्तिशाली टॉनिक है। इसमें प्राकृतिक रूप से कार्बोहाईड्रेट आदि सभी विटामिन, क्षार एवं श्रेष्ठ प्रोटीन उपस्थित हैं। इसके सेवन से असंख्य लोगों को विभिन्न प्रकार के रोगों से मुक्ति मिली है।
उदाहरणार्थः मूत्राशय की पथरी, हृदयरोग, डायबिटीज, पायरिया एवं दाँत के अन्य रोग, पीलिया, लकवा, दमा, पेट दुखना, पाचन क्रिया की दुर्बलता, अपच, गैस, विटामिन ए, बी आदि के अभावोत्पन्न रोग, जोड़ों में सूजन, गठिया, संधिशोथ, त्वचासंवेदनशीलता (स्किन एलर्जी) सम्बन्धी बारह वर्ष पुराने रोग, आँखों का दौर्बल्य, केशों का श्वेत होकर झड़ जाना, चोट लगे घाव तथा जली त्वचा सम्बन्धी सभी रोग।
हजारों रोगियों एवं निरोगियों ने भी अपनी दैनिक खुराकों में बिना किसी प्रकार के हेर-फेर किये गेहूँ के ज्वारों के रस से बहुत थोड़े समय में चमत्कारिक लाभ प्राप्त किये हैं। ये अपना अनुभव बताते हैं कि ज्वारों के रस से आँख, दाँत और केशों को बहुत लाभ पहुँचता है। कब्जी मिट जाती है, अत्यधिक कार्यशक्ति आती है और थकान नहीं होती।
गेहूँ के ज्वारे उगाने की विधि
मिट्टी के नये खप्पर, कुंडे या सकोरे लें। उनमें खाद मिली मिट्टी लें। रासायनिक खाद का उपयोग बिलकुल न करें। पहले दिन कुंडे की सारी मिट्टी ढँक जाये इतने गेहूँ बोयें। पानी डालकर कुंडों को छाया में रखें। सूर्य की धूप कुंडों को अधिक या सीधी न लग पाये इसका ध्यान रखें।
इसी प्रकार दूसरे दिन दूसरा कुंडा या मिट्टी का खप्पर बोयें और प्रतिदिन एक बढ़ाते हुए नौवें दिन नौवां कुंडा बोयें। सभी कुंडों को प्रतिदिन पानी दें। नौवें दिन पहले कुंडे में उगे गेहूँ काटकर उपयोग में लें। खाली हो चुके कुंडे में फिर से गेहूँ उगा दें। इसी प्रकार दूसरे दिन दूसरा, तीसरे दिन तीसरा करते चक्र चलाते जायें। इस प्रक्रिया में भूलकर भी प्लास्टिक के बर्तनों का उपयोग कदापि न करें।
प्रत्येक कुटुम्ब अपने लिए सदैव के उपयोगार्थ 10, 20, 30 अथवा इससे भी अधिक कुंडे रख सकता है। प्रतिदिन व्यक्ति के उपयोग अनुसार एक, दो या अधिक कुंडे में गेहूँ बोते रहें। मध्याह्न के सूर्य की सख्त धूप न लगे परन्तु प्रातः अथवा सायंकाल का मंद ताप लगे ऐसे स्थान में कुंडों को रखें।
सामान्यतया आठ-दस दिन नें गेहूँ के ज्वारे पाँच से सात इंच तक ऊँचे हो जायेंगे। ऐसे ज्वारों में अधिक से अधिक गुण होते हैं। ज्यो-ज्यों ज्वारे सात इंच से अधिक बड़े होते जायेंगे त्यों-त्यों उनके गुण कम होते जायेंगे। अतः उनका पूरा-पूरा लाभ लेने के लिए सात इंच तक बड़े होते ही उनका उपयोग कर लेना चाहिए।
ज्वारों की मिट्टी के धरातल से कैंची द्वारा काट लें अथवा उन्हें समूल खींचकर उपयोग में ले सकते हैं। खाली हो चुके कुंडे में फिर से गेहूँ बो दीजिये। इस प्रकार प्रत्येक दिन गेहूँ बोना चालू रखें।
ज्वारों का रस बनाने की विधि
जब समय अनुकूल हो तभी ज्वारे काटें। काटते ही तुरन्त धो डालें। धोते ही उन्हें कूटें। कूटते ही उन्हें कपड़े से छान लें।
इसी प्रकार उसी ज्वारे को तीन बार कूट-कूट कर रस निकालने से अधिकाधिक रस प्राप्त होगा। चटनी बनाने अथवा रस निकालने की मशीनों आदि से भी रस निकाला जा सकता है। रस को निकालने के बाद विलम्ब किये बिना तुरन्त ही उसे धीरे-धीरें पियें। किसी सशक्त अनिवार्य कारण के अतिररिक्त एक क्षण भी उसको पड़ा न रहने दें, कारण कि उसका गुण प्रतिक्षण घटने लगता है और तीन घंटे में तो उसमें से पोषक तत्व ही नष्ट हो जाता है। प्रातःकाल खाली पेट यह रस पीने से अधिक लाभ होता है।
दिन में किसी भी समय ज्वारों का रस पिया जा सकता है। परन्तु रस लेने के आधा घंटा पहले और लेने के आधे घंटे बाद तक कुछ भी खाना-पीना न चाहिए। आरंभ में कइयों को यह रस पीने के बाद उबकाई आती है, उलटी हो जाती है अथवा सर्दी हो जाती है। परंतु इससे घबराना न चाहिए। शरीर में कितने ही विष एकत्रित हो चुके हैं यह प्रतिक्रिया इसकी निशानी है। सर्दी, दस्त अथवा उलटी होने से शरीर में एकत्रित हुए वे विष निकल जायेंगे।
ज्वारों का रस निकालते समय मधु, अदरक, नागरबेल के पान (खाने के पान) भी डाले जा सकते हैं। इससे स्वाद और गुण का वर्धन होगा और उबकाई नहीं आयेगी। विशेषतया यह बात ध्यान में रख लें कि ज्वारों के रस में नमक अथवा नींबू का रस तो कदापि न डालें।
रस निकालने की सुविधा न हो तो ज्वारे चबाकर भी खाये जा सकते हैं। इससे दाँत मसूढ़े मजबूत होंगे। मुख से यदि दुर्गन्ध आती हो तो दिन में तीन बार थोड़े-थोड़े ज्वारे चबाने से दूर हो जाती है। दिन में दो या तीन बार ज्वारों का रस लीजिये।
रामबाण इलाज
जीवन और मरण के बीच जूझते रोगियों को प्रतिदिन चार बड़े गिलास भरकर ज्वारों का रस दिया जाता है। जीवन की आशा ही जिन रोगियों ने छोड़ दी उन रोगियों को भी तीन दिन या उससे भी कम समय में चमत्कारिक लाभ होता देखा गया है। ज्वारे के रस से रोगी को जब इतना लाभ होता है, तब नीरोग व्यक्ति ले तो कितना अधिक लाभ होगा?
सस्ता और सर्वोत्तम ज्वारों का रस
ज्वारों का रस दूध, दही और मांस से अनेक गुना अधिक गुणकारी है। दूध और मांस में भी जो नहीं है उससे अधिक इस ज्वारे के रस में है। इसके बावजूद दूध, दही और मांस से बहुत सस्ता है। घर में उगाने पर सदैव सुलभ है। गरीब से गरीब व्यक्ति भी इस रस का उपयोग करके अपना खोया स्वास्थ्य फिर से प्राप्त कर सकता है। गरीबों के लिए यह ईश्वरीय आशीर्वाद है। नवजात शिशु से लेकर घर के छोटे-बड़े, अबालवृद्ध सभी ज्वारे के रस का सेवन कर सकते हैं। नवजात शिशु को प्रतिदिन पाँच बूँद दी जा सकती है।
ज्वारे के रस में लगभग समस्त क्षार और विटामिन उपलब्ध हैं। इसी कारण से शरीर मे जो कुछ भी अभाव हो उसकी पूर्ति ज्वारे के रस द्वारा आश्चर्यजनक रूप से हो जाती है। इसके द्वारा प्रत्येक ऋतु में नियमित रूप से प्राणवायु, खनिज, विटामिन, क्षार और शरीरविज्ञान में बताये गये कोषों को जीवित रखने से लिए आवश्यक सभी तत्त्व प्राप्त किये जा सकते हैं।
डॉक्टर की सहायता के बिना गेहूँ के ज्वारों का प्रयोग आरंभ करो और खोखले हो चुके शरीर को मात्र तीन सप्ताह में ही ताजा, स्फूर्तिशील एवं तरावटदार बना दो।
ज्वारों के रस के सेवन के प्रयोग किये गये हैं। कैंसर जैसे असाध्य रोग मिटे हैं। शरीर ताम्रवर्णी और पुष्ट होते पाये गये हैं।
आम्बा हल्दी से कैंसर का इलाज
भारत में हल्दी का इस्तेमाल मसाले, सौंदर्य प्रसाधनों और दवा के तौर पर किया जाता है। इसे 'लाख दुखों की एक दवा' कहना भी गलत नहीं होगा। लेकिन, क्या आप जानते हैं कि कैंसर के इलाज में भी हल्दी बेहद कारगर औषधि साबित होती है. हल्दी में जल, प्रोटीन, वसा, खनिज पदार्थ, रेशा, फाइबर, मैंगनीज, पोटेशियम, कार्बोहाइड्रेट, कैल्शियम, फास्फोरस, आयरन, ओमेगा 3 और ओमेगा 6, फैटी एसिड, विटामिन ए, विटामिन बी, विटामिन सी के स्रोत तथा कैलोरी भी पाई जाती है। हल्दी में पाया जाने वाला करकुमिन कैंसर के इलाज में बेहद मददगार है।
कैंसर का इलाज और हल्दी
हल्दी की जड़ों में पाया जाने वाला करक्यूमिन न सिर्फ खाने को स्वाद बनाता है, बल्कि साथ ही दोबारा कैंसर होने के खतरे को भी कम करता है।
हल्दी का नियमित सेवन कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से बचा सकता है। हल्दी में एंटीसेप्टिक गुण मौजूद होता हैं, जो इंफेक्शन होने से बचाता है। जीवाणुरोधी होने के साथ-साथ हल्दी दर्द से भी राहत दिलाती है।
कैंसर के इलाज के दौरान कीमोथेरेपी से बेअसर रहीं कोशिकाओं को हल्दी खत्म कर सकती है। लगभग 2-4 ग्राम की मात्रा में हल्दी का बारीक चूर्ण सुबह-शाम सेवन करने से कैंसर की गांठे धीरे-धीरे घुल जाती हैं।
हल्दी का इस्तेमाल सब्जी बनाने में होता है। यह सेहत के लिए भी यह गुणकारी होती है। लेकिन, आपको यह जानकार हैरानी होगी कि इसमें पाए जाने वाला एक तत्व करक्यूमिन" कैंसर कोशिकाओं को खत्म कर सकता है।
हल्दी में पाए जाने वाला रसायन "करक्यूमिन" कैंसर कोशिकाओं को खत्म करने में सक्षम है। "करक्यूमिन" 24 घंटों के अंदर कैंसर कोशिकाओं को खत्म कर देता है।
प्राकृतिक चीजों में खराब हो चुकी कोशिकाओं को ठीक करने की क्षमता होती है।
आयुर्वेद में हल्दी को एक महत्वपूर्ण औषधि कहा गया है। कैंसर के इलाज में भी यह बहुत लाभकारी है। इसमें प्रभावशाली उपचारक शक्ति होती है। साथ ही हल्दी पूरी तरह सुरक्षित औषधि है। इसका कोई साइड इफेक्ट भी नहीं होता। यह बेहतरीन एंटीऑक्सिडेंट है. जो कैंसर को कंट्रोल करता है।
हल्दी कैंसर के जीवाणुओं के संक्रमण को कम करने में मदद करती है। इसका सेवन करने से कैंसर होने का खतरा काफी हद तक कम हो सकता है।
हल्दी की जड़ों में पाया जाने वाला करक्यूमिन न सिर्फ खाने को स्वाद बनाता है, बल्कि साथ ही दोबारा कैंसर होने के खतरे को भी कम करता है।
हल्दी का नियमित सेवन कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से बचा सकता है। हल्दी में एंटीसेप्टिक गुण मौजूद होता हैं, जो इंफेक्शन होने से बचाता है। जीवाणुरोधी होने के साथ-साथ हल्दी दर्द से भी राहत दिलाती है।
कैंसर के इलाज के दौरान कीमोथेरेपी से बेअसर रहीं कोशिकाओं को हल्दी खत्म कर सकती है। लगभग 2-4 ग्राम की मात्रा में हल्दी का बारीक चूर्ण सुबह-शाम सेवन करने से कैंसर की गांठे धीरे-धीरे घुल जाती हैं।भारत में हल्दी का इस्तेमाल मसाले, सौंदर्य प्रसाधनों और दवा के तौर पर किया जाता है। इसे 'लाख दुखों की एक दवा' कहना भी गलत नहीं होगा। लेकिन, क्या आप जानते हैं कि कैंसर के इलाज में भी हल्दी बेहद कारगर औषधि साबित होती है. हल्दी में जल, प्रोटीन, वसा, खनिज पदार्थ, रेशा, फाइबर, मैंगनीज, पोटेशियम, कार्बोहाइड्रेट, कैल्शियम, फास्फोरस, आयरन, ओमेगा 3 और ओमेगा 6, फैटी एसिड, विटामिन ए, विटामिन बी, विटामिन सी के स्रोत तथा कैलोरी भी पाई जाती है। हल्दी में पाया जाने वाला करकुमिन कैंसर के इलाज में बेहद मददगार है।
हल्दी कैंसर के जीवाणुओं के संक्रमण को कम करने में मदद करती है। इसका सेवन करने से कैंसर होने का खतरा काफी हद तक कम हो सकता है।
ल्यूकेमिया
ल्यूकेमिया रक्त कोशिकाओं का कैंसर हैं। शरीर में ल्यूकेमिया के सेल्स की कोई खास वजह का अभी तक पता नहीं चल पाया है। लेकिन ल्यूकेमिया होने का खतरा किन कारणों से होता है, इसकी पहचान करने में सफलता मिल चुकी है। ल्यूकीमिया चार प्रकार के होते हैं एक्यूट लिम्फोसाईटिक ल्यूकीमिया, क्रोनिक लिम्फोसाईटिक ल्यूकीमिया, एक्यूट माइलोसाईटिक ल्यूकीमिया और क्रोनिक माइलोसाईटिक ल्यूकीमिया। ल्यूकेमिया के इलाज के लिए कीमोथेरेपी व रेडिएशन थेरेपी का प्रयोग किया जाता है। ल्यूकेमिया का पता शुरुआती अवस्था में चलने पर इसकी तुरंत रोक थाम कर इसे पूरी तरह से नष्ट किया जा सकता है।
मछली के तेल से ल्यूकेमिया का ईलाज
मछली का तेल रोगी के शरीर से कैंसर के सेल्स को ढूंढ कर खत्म कर देता है। वैज्ञानिकों द्वारा किए गए शोध में उन्होंने पाया कि मछली का तेल में पाए जाने वाला ओमेगा 3 फैटी एसिड से बना यौगिक ल्यूकेमिया के सेल्स को पूरी तरह से नष्ट करने में कामयाब रहा। इस यौगिक का नाम डेल्टा-12-प्रोटाग्लैंडिन जे 3 (डी12-पीजीजे3) है। ओमेगा-3 में ल्यूकेमिया की वजह बनने वाली कोशिकाओं को खत्म करने की क्षमता होती है।
अन्य ईलाजों की अपेक्षा में मछली के तेल से ब्लड कैंसर के ईलाज के कई लाभ हैं। आईए जानें क्या हैं वे लाभ।
बिना किसी सेल के नुकसान के मछली के तेल से ल्यूकेमिया का इलाज संभव है।
रेडिएशन व कीमोथेरपी की अपेक्षा इसके दुष्प्रभाव काफी कम होते हैं।
इससे रक्त कोशिकाओं की संख्या तेजी से बढ़ती है और स्पलीन (spleen) अपने सामान्य आकार में वापस आता है।
अन्य ईलाजों में रोगी को हमेशा दवा लेनी पड़ती है और दवा छोड़ने पर कैंसर के सेल्स के फिर से होने का खतरा रहता है। लेकिन वैज्ञानिकों के मुताबिक इस ईलाज से कैंसर के सेल्स की वापसी की संभावना बहुत कम होती है।
> सफेद पुनर्नवा की 10 ग्राम जड़ एवं बरना की 10 ग्राम जड़ एवं 10 ग्राम आम्बा हल्दी को 400 मि.ली. पानी में लेकर उसका 50 मि.ली. काढ़ा करके पीने से कैंसर की कच्ची गाँठें पिघल जाती हैं।
> हरड़, सेंधा नमक एवं धावई के फूल समान मात्रा में लेकर चूर्ण बनाकर 2 से 5 ग्राम चूर्ण शहद के साथ लेने से कैंसर में लाभ होता है।
>कैंसर की रोकथाम, दूषित खून की सफाई, डिमेंशिया से छुटकारा, गठिया, हानिकारक बेक्टीरिया और वायरस का सफाया, रोगों से लडऩे की क्षमता में इजाफा ....जैसे कई नायाब गुणों के साथ ही हल्दी में एक अन्य विशेष खूबी भी पाई जाती है। यदि कभी किसी को कोई चोट-मोच या जर्क लग जाए तथा दर्द, जकडऩ और सूजन की तकलीफ हो रही हो तो ऐसे में हल्दी का यह प्रयोग अवश्य करना चाहिये।
प्रयोग: चार चम्मच संरसों के तेल में 1चम्मच पिसी हल्दी लेकर धीमी आंच पर पका लें, इसमें 4-5 कलियां लहसुन की भी डाल दी जाएं तो लाभ और भी जल्दी होता है। थोड़ा ठंडा या गुनगना रहने पर किसी साफ कॉटन के साथ इस तेल में पकी हुई हल्दी को चोट के स्थान पर लगाकर बांध लें। कुछ ही घंटों में चोट और सूजन में काफी लाभ होगा।दूध के साथ प्रयोग: दो-तीन दिन लगातार दूध मे 1-चम्मच हल्दी पावडर डालकर पीने से भी चोट-मोच, दर्द और सूजन में तत्काल राहत मिलती है।
कैंसर में गेहूँ के ज्वारे
गेहूँ के बोने पर जो एक ही पत्ता उगकर ऊपर आता है उसे ज्वारा कहा जाता है। नवरात्रि आदि उत्सवों में यह घर-घर में छोटे-छोटे मिट्टी के पात्रों में मिट्टी डालकर बोया जाता है।
गेहूँ के ज्वारे का रस, प्रकृति के गर्भ में छिपी औषधियों के अक्षय भंडार में से मानव को प्राप्त एक अनुपम भेंट है। शरीर के आरोग्यार्थ यह रस इतना अधिक उपयोगी सिद्ध हुआ है कि विदेशी जीववैज्ञानिकों ने इसे 'हरा लहू' (Green Blood) कहकर सम्मानित किया है। डॉ. एन. विगमोर नामक एक विदेशी महिला ने गेहूँ के कोमल ज्वारों के रस से अनेक असाध्य रोगों को मिटाने के सफल प्रयोग किये हैं। उपरोक्त ज्वारों के रस द्वारा उपचार से 350 से अधिक रोग मिटाने के आश्चर्यजनक परिणाम देखने में आये हैं। जीव-वनस्पति शास्त्र में यह प्रयोग बहुत मूल्यवान है।
गेहूँ के ज्वारों के रस में रोगों के उन्मूलन की एक विचित्र शक्ति विद्यमान है। शरीर के लिए यह एक शक्तिशाली टॉनिक है। इसमें प्राकृतिक रूप से कार्बोहाईड्रेट आदि सभी विटामिन, क्षार एवं श्रेष्ठ प्रोटीन उपस्थित हैं। इसके सेवन से असंख्य लोगों को विभिन्न प्रकार के रोगों से मुक्ति मिली है।
उदाहरणार्थः मूत्राशय की पथरी, हृदयरोग, डायबिटीज, पायरिया एवं दाँत के अन्य रोग, पीलिया, लकवा, दमा, पेट दुखना, पाचन क्रिया की दुर्बलता, अपच, गैस, विटामिन ए, बी आदि के अभावोत्पन्न रोग, जोड़ों में सूजन, गठिया, संधिशोथ, त्वचासंवेदनशीलता (स्किन एलर्जी) सम्बन्धी बारह वर्ष पुराने रोग, आँखों का दौर्बल्य, केशों का श्वेत होकर झड़ जाना, चोट लगे घाव तथा जली त्वचा सम्बन्धी सभी रोग।
हजारों रोगियों एवं निरोगियों ने भी अपनी दैनिक खुराकों में बिना किसी प्रकार के हेर-फेर किये गेहूँ के ज्वारों के रस से बहुत थोड़े समय में चमत्कारिक लाभ प्राप्त किये हैं। ये अपना अनुभव बताते हैं कि ज्वारों के रस से आँख, दाँत और केशों को बहुत लाभ पहुँचता है। कब्जी मिट जाती है, अत्यधिक कार्यशक्ति आती है और थकान नहीं होती।
गेहूँ के ज्वारे उगाने की विधि
मिट्टी के नये खप्पर, कुंडे या सकोरे लें। उनमें खाद मिली मिट्टी लें। रासायनिक खाद का उपयोग बिलकुल न करें। पहले दिन कुंडे की सारी मिट्टी ढँक जाये इतने गेहूँ बोयें। पानी डालकर कुंडों को छाया में रखें। सूर्य की धूप कुंडों को अधिक या सीधी न लग पाये इसका ध्यान रखें।
इसी प्रकार दूसरे दिन दूसरा कुंडा या मिट्टी का खप्पर बोयें और प्रतिदिन एक बढ़ाते हुए नौवें दिन नौवां कुंडा बोयें। सभी कुंडों को प्रतिदिन पानी दें। नौवें दिन पहले कुंडे में उगे गेहूँ काटकर उपयोग में लें। खाली हो चुके कुंडे में फिर से गेहूँ उगा दें। इसी प्रकार दूसरे दिन दूसरा, तीसरे दिन तीसरा करते चक्र चलाते जायें। इस प्रक्रिया में भूलकर भी प्लास्टिक के बर्तनों का उपयोग कदापि न करें।
प्रत्येक कुटुम्ब अपने लिए सदैव के उपयोगार्थ 10, 20, 30 अथवा इससे भी अधिक कुंडे रख सकता है। प्रतिदिन व्यक्ति के उपयोग अनुसार एक, दो या अधिक कुंडे में गेहूँ बोते रहें। मध्याह्न के सूर्य की सख्त धूप न लगे परन्तु प्रातः अथवा सायंकाल का मंद ताप लगे ऐसे स्थान में कुंडों को रखें।
सामान्यतया आठ-दस दिन नें गेहूँ के ज्वारे पाँच से सात इंच तक ऊँचे हो जायेंगे। ऐसे ज्वारों में अधिक से अधिक गुण होते हैं। ज्यो-ज्यों ज्वारे सात इंच से अधिक बड़े होते जायेंगे त्यों-त्यों उनके गुण कम होते जायेंगे। अतः उनका पूरा-पूरा लाभ लेने के लिए सात इंच तक बड़े होते ही उनका उपयोग कर लेना चाहिए।
ज्वारों की मिट्टी के धरातल से कैंची द्वारा काट लें अथवा उन्हें समूल खींचकर उपयोग में ले सकते हैं। खाली हो चुके कुंडे में फिर से गेहूँ बो दीजिये। इस प्रकार प्रत्येक दिन गेहूँ बोना चालू रखें।
ज्वारों का रस बनाने की विधि
जब समय अनुकूल हो तभी ज्वारे काटें। काटते ही तुरन्त धो डालें। धोते ही उन्हें कूटें। कूटते ही उन्हें कपड़े से छान लें।
इसी प्रकार उसी ज्वारे को तीन बार कूट-कूट कर रस निकालने से अधिकाधिक रस प्राप्त होगा। चटनी बनाने अथवा रस निकालने की मशीनों आदि से भी रस निकाला जा सकता है। रस को निकालने के बाद विलम्ब किये बिना तुरन्त ही उसे धीरे-धीरें पियें। किसी सशक्त अनिवार्य कारण के अतिररिक्त एक क्षण भी उसको पड़ा न रहने दें, कारण कि उसका गुण प्रतिक्षण घटने लगता है और तीन घंटे में तो उसमें से पोषक तत्व ही नष्ट हो जाता है। प्रातःकाल खाली पेट यह रस पीने से अधिक लाभ होता है।
दिन में किसी भी समय ज्वारों का रस पिया जा सकता है। परन्तु रस लेने के आधा घंटा पहले और लेने के आधे घंटे बाद तक कुछ भी खाना-पीना न चाहिए। आरंभ में कइयों को यह रस पीने के बाद उबकाई आती है, उलटी हो जाती है अथवा सर्दी हो जाती है। परंतु इससे घबराना न चाहिए। शरीर में कितने ही विष एकत्रित हो चुके हैं यह प्रतिक्रिया इसकी निशानी है। सर्दी, दस्त अथवा उलटी होने से शरीर में एकत्रित हुए वे विष निकल जायेंगे।
ज्वारों का रस निकालते समय मधु, अदरक, नागरबेल के पान (खाने के पान) भी डाले जा सकते हैं। इससे स्वाद और गुण का वर्धन होगा और उबकाई नहीं आयेगी। विशेषतया यह बात ध्यान में रख लें कि ज्वारों के रस में नमक अथवा नींबू का रस तो कदापि न डालें।
रस निकालने की सुविधा न हो तो ज्वारे चबाकर भी खाये जा सकते हैं। इससे दाँत मसूढ़े मजबूत होंगे। मुख से यदि दुर्गन्ध आती हो तो दिन में तीन बार थोड़े-थोड़े ज्वारे चबाने से दूर हो जाती है। दिन में दो या तीन बार ज्वारों का रस लीजिये।
रामबाण इलाज
जीवन और मरण के बीच जूझते रोगियों को प्रतिदिन चार बड़े गिलास भरकर ज्वारों का रस दिया जाता है। जीवन की आशा ही जिन रोगियों ने छोड़ दी उन रोगियों को भी तीन दिन या उससे भी कम समय में चमत्कारिक लाभ होता देखा गया है। ज्वारे के रस से रोगी को जब इतना लाभ होता है, तब नीरोग व्यक्ति ले तो कितना अधिक लाभ होगा?
सस्ता और सर्वोत्तम ज्वारों का रस
ज्वारों का रस दूध, दही और मांस से अनेक गुना अधिक गुणकारी है। दूध और मांस में भी जो नहीं है उससे अधिक इस ज्वारे के रस में है। इसके बावजूद दूध, दही और मांस से बहुत सस्ता है। घर में उगाने पर सदैव सुलभ है। गरीब से गरीब व्यक्ति भी इस रस का उपयोग करके अपना खोया स्वास्थ्य फिर से प्राप्त कर सकता है। गरीबों के लिए यह ईश्वरीय आशीर्वाद है। नवजात शिशु से लेकर घर के छोटे-बड़े, अबालवृद्ध सभी ज्वारे के रस का सेवन कर सकते हैं। नवजात शिशु को प्रतिदिन पाँच बूँद दी जा सकती है।
ज्वारे के रस में लगभग समस्त क्षार और विटामिन उपलब्ध हैं। इसी कारण से शरीर मे जो कुछ भी अभाव हो उसकी पूर्ति ज्वारे के रस द्वारा आश्चर्यजनक रूप से हो जाती है। इसके द्वारा प्रत्येक ऋतु में नियमित रूप से प्राणवायु, खनिज, विटामिन, क्षार और शरीरविज्ञान में बताये गये कोषों को जीवित रखने से लिए आवश्यक सभी तत्त्व प्राप्त किये जा सकते हैं।
डॉक्टर की सहायता के बिना गेहूँ के ज्वारों का प्रयोग आरंभ करो और खोखले हो चुके शरीर को मात्र तीन सप्ताह में ही ताजा, स्फूर्तिशील एवं तरावटदार बना दो।
ज्वारों के रस के सेवन के प्रयोग किये गये हैं। कैंसर जैसे असाध्य रोग मिटे हैं। शरीर ताम्रवर्णी और पुष्ट होते पाये गये हैं।
आम्बा हल्दी से कैंसर का इलाज
भारत में हल्दी का इस्तेमाल मसाले, सौंदर्य प्रसाधनों और दवा के तौर पर किया जाता है। इसे 'लाख दुखों की एक दवा' कहना भी गलत नहीं होगा। लेकिन, क्या आप जानते हैं कि कैंसर के इलाज में भी हल्दी बेहद कारगर औषधि साबित होती है. हल्दी में जल, प्रोटीन, वसा, खनिज पदार्थ, रेशा, फाइबर, मैंगनीज, पोटेशियम, कार्बोहाइड्रेट, कैल्शियम, फास्फोरस, आयरन, ओमेगा 3 और ओमेगा 6, फैटी एसिड, विटामिन ए, विटामिन बी, विटामिन सी के स्रोत तथा कैलोरी भी पाई जाती है। हल्दी में पाया जाने वाला करकुमिन कैंसर के इलाज में बेहद मददगार है।
कैंसर का इलाज और हल्दी
हल्दी की जड़ों में पाया जाने वाला करक्यूमिन न सिर्फ खाने को स्वाद बनाता है, बल्कि साथ ही दोबारा कैंसर होने के खतरे को भी कम करता है।
हल्दी का नियमित सेवन कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से बचा सकता है। हल्दी में एंटीसेप्टिक गुण मौजूद होता हैं, जो इंफेक्शन होने से बचाता है। जीवाणुरोधी होने के साथ-साथ हल्दी दर्द से भी राहत दिलाती है।
कैंसर के इलाज के दौरान कीमोथेरेपी से बेअसर रहीं कोशिकाओं को हल्दी खत्म कर सकती है। लगभग 2-4 ग्राम की मात्रा में हल्दी का बारीक चूर्ण सुबह-शाम सेवन करने से कैंसर की गांठे धीरे-धीरे घुल जाती हैं।
हल्दी का इस्तेमाल सब्जी बनाने में होता है। यह सेहत के लिए भी यह गुणकारी होती है। लेकिन, आपको यह जानकार हैरानी होगी कि इसमें पाए जाने वाला एक तत्व करक्यूमिन" कैंसर कोशिकाओं को खत्म कर सकता है।
हल्दी में पाए जाने वाला रसायन "करक्यूमिन" कैंसर कोशिकाओं को खत्म करने में सक्षम है। "करक्यूमिन" 24 घंटों के अंदर कैंसर कोशिकाओं को खत्म कर देता है।
प्राकृतिक चीजों में खराब हो चुकी कोशिकाओं को ठीक करने की क्षमता होती है।
आयुर्वेद में हल्दी को एक महत्वपूर्ण औषधि कहा गया है। कैंसर के इलाज में भी यह बहुत लाभकारी है। इसमें प्रभावशाली उपचारक शक्ति होती है। साथ ही हल्दी पूरी तरह सुरक्षित औषधि है। इसका कोई साइड इफेक्ट भी नहीं होता। यह बेहतरीन एंटीऑक्सिडेंट है. जो कैंसर को कंट्रोल करता है।
हल्दी कैंसर के जीवाणुओं के संक्रमण को कम करने में मदद करती है। इसका सेवन करने से कैंसर होने का खतरा काफी हद तक कम हो सकता है।
हल्दी की जड़ों में पाया जाने वाला करक्यूमिन न सिर्फ खाने को स्वाद बनाता है, बल्कि साथ ही दोबारा कैंसर होने के खतरे को भी कम करता है।
हल्दी का नियमित सेवन कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से बचा सकता है। हल्दी में एंटीसेप्टिक गुण मौजूद होता हैं, जो इंफेक्शन होने से बचाता है। जीवाणुरोधी होने के साथ-साथ हल्दी दर्द से भी राहत दिलाती है।
कैंसर के इलाज के दौरान कीमोथेरेपी से बेअसर रहीं कोशिकाओं को हल्दी खत्म कर सकती है। लगभग 2-4 ग्राम की मात्रा में हल्दी का बारीक चूर्ण सुबह-शाम सेवन करने से कैंसर की गांठे धीरे-धीरे घुल जाती हैं।भारत में हल्दी का इस्तेमाल मसाले, सौंदर्य प्रसाधनों और दवा के तौर पर किया जाता है। इसे 'लाख दुखों की एक दवा' कहना भी गलत नहीं होगा। लेकिन, क्या आप जानते हैं कि कैंसर के इलाज में भी हल्दी बेहद कारगर औषधि साबित होती है. हल्दी में जल, प्रोटीन, वसा, खनिज पदार्थ, रेशा, फाइबर, मैंगनीज, पोटेशियम, कार्बोहाइड्रेट, कैल्शियम, फास्फोरस, आयरन, ओमेगा 3 और ओमेगा 6, फैटी एसिड, विटामिन ए, विटामिन बी, विटामिन सी के स्रोत तथा कैलोरी भी पाई जाती है। हल्दी में पाया जाने वाला करकुमिन कैंसर के इलाज में बेहद मददगार है।
हल्दी कैंसर के जीवाणुओं के संक्रमण को कम करने में मदद करती है। इसका सेवन करने से कैंसर होने का खतरा काफी हद तक कम हो सकता है।
ल्यूकेमिया
ल्यूकेमिया रक्त कोशिकाओं का कैंसर हैं। शरीर में ल्यूकेमिया के सेल्स की कोई खास वजह का अभी तक पता नहीं चल पाया है। लेकिन ल्यूकेमिया होने का खतरा किन कारणों से होता है, इसकी पहचान करने में सफलता मिल चुकी है। ल्यूकीमिया चार प्रकार के होते हैं एक्यूट लिम्फोसाईटिक ल्यूकीमिया, क्रोनिक लिम्फोसाईटिक ल्यूकीमिया, एक्यूट माइलोसाईटिक ल्यूकीमिया और क्रोनिक माइलोसाईटिक ल्यूकीमिया। ल्यूकेमिया के इलाज के लिए कीमोथेरेपी व रेडिएशन थेरेपी का प्रयोग किया जाता है। ल्यूकेमिया का पता शुरुआती अवस्था में चलने पर इसकी तुरंत रोक थाम कर इसे पूरी तरह से नष्ट किया जा सकता है।
मछली के तेल से ल्यूकेमिया का ईलाज
मछली का तेल रोगी के शरीर से कैंसर के सेल्स को ढूंढ कर खत्म कर देता है। वैज्ञानिकों द्वारा किए गए शोध में उन्होंने पाया कि मछली का तेल में पाए जाने वाला ओमेगा 3 फैटी एसिड से बना यौगिक ल्यूकेमिया के सेल्स को पूरी तरह से नष्ट करने में कामयाब रहा। इस यौगिक का नाम डेल्टा-12-प्रोटाग्लैंडिन जे 3 (डी12-पीजीजे3) है। ओमेगा-3 में ल्यूकेमिया की वजह बनने वाली कोशिकाओं को खत्म करने की क्षमता होती है।
अन्य ईलाजों की अपेक्षा में मछली के तेल से ब्लड कैंसर के ईलाज के कई लाभ हैं। आईए जानें क्या हैं वे लाभ।
बिना किसी सेल के नुकसान के मछली के तेल से ल्यूकेमिया का इलाज संभव है।
रेडिएशन व कीमोथेरपी की अपेक्षा इसके दुष्प्रभाव काफी कम होते हैं।
इससे रक्त कोशिकाओं की संख्या तेजी से बढ़ती है और स्पलीन (spleen) अपने सामान्य आकार में वापस आता है।
अन्य ईलाजों में रोगी को हमेशा दवा लेनी पड़ती है और दवा छोड़ने पर कैंसर के सेल्स के फिर से होने का खतरा रहता है। लेकिन वैज्ञानिकों के मुताबिक इस ईलाज से कैंसर के सेल्स की वापसी की संभावना बहुत कम होती है।
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